तस्वीर…. (लघुकथा)

“कितनी ख़ूबसूरत हो! तुम्हें तो मॉडल बनना चाहिए! बस, जल्दी से एक अच्छी सी तस्वीर खिंचवाकर भेज दो... मेरे अंकल की ऐड एजेंसी है... देखना... काम की लाइन लग जाएगी!”

उन्नीसवें साल में चल रही थी विपाशा। तारीफ़ के शब्द कानों में रस की तरह घुल गए। ख़ुशी से झूमते मन को थोड़ा नियंत्रित किया, और संजीदगी से मुस्करा दी।

थोड़ी देर समीर की ओर ध्यान से देखा फिर पूछ बैठी, “मॉडलिंग? सचमुच?”

“अरे, और क्या?”

इस उम्र में मॉडलिंग का सपना अधिकतर लड़के-लड़कियों को लुभाता ही है! ग्लैमर की वह चमक-दमक किसे नहीं मोह लेती? विपाशा भी तो कोई अलग न थी!

वह जानती थी, उसकी ख़ूबसूरती के जगह-जगह चर्चे हैं। यह भी जानती थी कि समीर उसकी ख़ूबसूरती पर मरता था। समीर ही क्या, जाने कितने लड़के उसके दीवाने हुए फिरते थे। पूरे कॉलेज में उसकी ही ख़ूबसूरती के चर्चे होते! लड़के उससे बात करने को तरसते, तो न जाने कितनी लड़कियाँ उसकी ख़ूबसूरती से जलतीं भी थीं। नाज़ुक सी दिखने वाली विपाशा न अपनी लोकप्रियता से बेख़बर थी और न ही जलने वालों की नज़र से! अपने रूप के आकर्षण का असर ख़ूब जानती, समझती थी।

नहीं समझ पाती थी तो बस इतना कि इस मनमोहक, भड़कीली दुनिया के पीछे ज़िंदगी कैसी है?

ऐसा तो नहीं कि एक तस्वीर खिंचवाने के बाद कहीं ज़िंदगी बस तस्वीर ही बनकर रह जाए?

तमाम सवालों को मन में सँजोए, बस अपने में ही रह गई। न समीर के मशविरे को
गंभीरता से लिया और न ही घर-परिवार में इसकी चर्चा तक की। जानती थी, उसके
माता-पिता ग्लैमर की उस दुनिया में उसे जाने न देंगे। और, ख़ुद को तस्वीर में बदलने की उसमें भी कोई ख़ास चाहत न थी।

यों तो, सभी आते हैं दुनिया में एक न एक दिन तस्वीर बन जाने के लिए...

लेकिन उसे फ़िलहाल तस्वीर बनना मंज़ूर न था। कुछ सोचा, कुछ विचारा, और जल्दी ही समीर का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

आज तीस बरस बीत चुके हैं। अपने भरे-पूरे परिवार को संभालती, दो बच्चों की माँ
विपाशा को एक बार फिर मॉडलिंग का ऑफ़र आया है। यह ऑफ़र कहीं और से नहीं, ख़ुद उसी विज्ञापन एजेंसी से आया है जहाँ अभी-अभी उसकी बेटी ने ज्वाइन किया है। बेटी के बॉस ने पहली मुलाक़ात में ही विपाशा के सामने अपना प्रस्ताव रखा... सुनकर बेटी ख़ुशी से उछल पड़ी, बेटे के चेहरे पर भी ख़ुशी स्पष्ट नज़र आ रही थी और पति की आँखों में प्रशंसा के भाव जगमगा रहे थे।

आज इस प्रस्ताव को वह नज़रंदाज़ नहीं कर सकती थी। उसकी बेटी की नौकरी का सवाल था! उसके बॉस को मना करके नाराज़ कैसे कर सकती थी? पशोपेश में चुप रह गई।

बस, सोचती रह गई, यह समीर अब क्या चाहता है?

क्या सचमुच आज भी उसे विपाशा के व्यक्तित्व में मॉडलिंग के लायक आकर्षण दीखता है? या, बस यूँ ही, बहला रहा है?

क्या पुरानी दोस्ती में ताज़गी भरना चाहता है? या फिर, पिछली बार सुझाव न
मानने का कोई बदला ले रहा है?

समझ नहीं पा रही थी कि समीर क्या चाहता है! और न ही, अपनी नियति समझ पा रही थी...

तस्वीर बनने के जिस प्रस्ताव को उसने तीस बरस पहले ठुकरा दिया था, ज़िंदगी फिर से उसी प्रस्ताव को लिए उसके सामने खड़ी थी... और, ज़िंदगी के अजब चक्र को वह चुपचाप, हैरानी से देख रही थी।

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