दोस्त न रही…

दोस्त न रही...

(लघुकथा) 

 

स्कूल से कॉलेज तक मशहूर रही थी उनकी दोस्ती। जहाँ जातीं साथ जातीं... पढ़ाई भी साथ तो घुमाई-फिराई भी साथ! मौज-मस्ती भी साथ, स्पोर्ट्स-डिबेट वगैरह भी साथ-साथ। फिर, कभी अपनी-अपनी मम्मियों की दी हुई लिस्ट पर शॉपिंग करने भी दोनों साथ ही निकल पड़तीं।

देखने वाले समझते, बहनें हैं दोनों! जानने वाले सोचते, कैसे रहेंगी ये दोनों एक-दूसरे के बिना। लड़कियाँ थीं... आख़िर, शादी के बाद अलग-अलग घरों में जाना ही पड़ेगा! यों तो लड़कों को भी अपनी नौकरी-करियर वगैरह के लिए कई बार अपने दोस्तों से दूर जाना ही पड़ता है, लेकिन लड़कियों को दूसरे घर जाना होता है, फिर ससुराल में पता नहीं उनकी दोस्ती पसंद की जाए या नहीं! जितने लोग, उतनी सोच, सब अपने-अपने ढंग से सोचते...

पर वो दोनों कुछ भी न सोचतीं। दोस्ती है, कोई प्यार-मोहब्बत थोड़ी, जिसमें पहले से ही बिछड़ने की सोच-सोचकर अपना दिमाग ख़राब किया जाए! दोस्ती है, कोई रिश्तेदारी थोड़ी, जिसमें दिमाग लगाया जाए!

उम्र बढ़ने के साथ दोनों की विचारशीलता बढ़ी... नतीजन अक्सर मतभेद भी हो जाते... एक पूरब जाना चाहती तो दूसरी पश्चिम! लेकिन, दोस्ती की गाँठ ऐसी, कि कहीं न कहीं बीच में दोनों आ ही जातीं! समझौता हो जाता और मनभेद न आने पाता।

कॉलेज पूरा होने को था, अब दोनों नौकरी की तलाश में थीं। दोनों ने अलग-अलग विषयों में पढ़ाई की थी, फिर भी साथ रहीं। अब नौकरी में कैसे दोनों साथ रह पाएँगी? लेकिन संयोग ही था कि नौकरियाँ भी एक ही जगह मिल गईं... एक ही दफ़्तर में नहीं, लेकिन एक ही बिल्डिंग के दो अलग-अलग दफ़्तरों में।

‘अब क्या शादी भी एक ही घर में करोगी?’ उस दिन अदिति की माँ ने हँसते हुए पूछा तो दोनों हँस दीं।

“आईडिया बुरा नहीं है, आंटी,” जवाब आरती ने दिया था।

संयोग देखिए, जल्दी ही दोनों को एक ही समय में प्यार हुआ... बेशक, अलग-अलग लड़कों से!

इधर अदिति की बातचीत अपने एक सहकर्मी के साथ कुछ अधिक ही होने लगी। दोनों में बातचीत बढ़ी, तो मिलना-जुलना भी बढ़ा और अपनापन भी... उधर आरती के साथ भी बिलकुल ऐसा ही हुआ। वह भी अपने एक सहकर्मी के प्यार में पड़ गई। पहले आकर्षण, फिर मोहब्बत ऐसी बढ़ी कि जल्दी ही रिश्ते की बात चली। परिवारों में आपत्तियाँ न हुईं, और जल्दी ही शादियाँ हो गईं!

आरती और अदिति ने केवल अपने-अपने पति और ससुराल में ही रिश्ता नहीं बनाया था। दोनों आपस में भी एक नए रिश्ते में बंधी थीं! अब दोनों एक ही घर की बहुएँ थीं...

अब दोनों देवरानी-जेठानी थीं!

अब दोनों दोस्त न रहीं...

क्यों?

ऐसी कौन सी बराबरी, कौन सा मुक़ाबला उपज जाता है रिश्तों में बंधकर, कि दोस्ती वाली सहजता नहीं रह पाती?

क्यों दिशाएँ बंट जाती हैं? क्यों मनभेद उपज जाते हैं? क्यों मिठास में कसैलापन आ
जाता है?

क्यों उम्मीदों का टोकरा इतना बड़ा हो जाता है जिसमें सहज प्रेम समा ही न सके?

***

सभी दोस्तों... और दोस्त-समान रिश्तों को समर्पित!

 

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