प्रदूषण प्रदूषण…

प्रदूषण प्रदूषण 

एक बार फिर वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन की रिपोर्ट आई है और एक बार फिर प्रदूषण के मामले में भारत के अनेक शहरों की स्थिति ने देश को चिंता में डाल दिया है। विश्व के बीस सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से चौदह हमारे देश में मौजूद हैं।

आज विश्व भर में दस में से नौ व्यक्ति प्रदूषित हवा में साँस ले रहा है। हृदय की बीमारियाँ, फेफड़ों में कैंसर आदि जैसी घातक बीमारियाँ वायु-प्रदूषण की ही देन हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि हमारे देश में प्रति वर्ष लगभग ग्यारह लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण के कारण ही होती है। लगभग हर वर्ष हम दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में स्वास्थ्य से सम्बन्धित आपातकालीन स्थिति का सामना करते हैं, जब पूरे क्षेत्र में स्मॉग के रूप में फैली विषैली हवा हमारे लिए घातक हो जाती है।
सचमुच बहुत ही चिंता का विषय है। लेकिन आज भी हम केवल आंशिक रूप से चिंतित होंगे और बहुत ही जल्दी ऐसी रिपोर्ट को ‘सचमुच चिंतनीय’ मानकर अपने ‘अधिक आवश्यक कामों’ में व्यस्त हो जायेंगे।

बचपन में एक बहुत ही सामान्य सा विज्ञान हम सभी ने पढ़ा... मनुष्य एवं अधिकतर सजीव प्राणी साँस लेते समय ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बनडाईऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं। इसके विपरीत, पेड़-पौधे ऑक्सीजन छोड़ते हैं और कार्बनडाईऑक्साइड ग्रहण करते हैं। इस तरह से हम जिस कार्बनडाईऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं उसे पेड़-पौधे ग्रहण कर लेते हैं, और हमारे लिए उपयोगी ऑक्सीजन का वे उत्सर्जन करते हैं।

यानी सीधी गणित यही समझाती है कि यदि हमें सांस लेने के लिए अच्छी ऑक्सीजन चाहिए तो हमारे लिए पेड़-पौधों की सबसे अधिक आवश्यकता है। इसका एक अर्थ यह भी होता है कि हमारी जनसंख्या के अनुपात में ही पेड़-पौधों की संख्या का होना भी ज़रूरी है। लेकिन क्या ऐसा है? आपके आसपास कितने पेड़-पौधे हैं?
अभी तो खुद हमारे द्वारा उत्सर्जित की गयी कार्बनडाईऑक्साइड का कुछ इंतेज़ाम नहीं हो सका था, उसपर हमने विकास के नाम पर जो मशीनें बनायीं वो और भी अधिक ज़हरीली गैस छोड़ती हैं। अभी तो हमारे पास मनुष्य द्वारा उत्सर्जित कार्बनडाईऑक्साइड को ग्रहण करने के लिए ही उपयुक्त मात्रा में पेड़ नहीं थे, उसपर अब मशीनों का प्रदूषण! कौन ग्रहण करेगा इन गैसों को? और कौन वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा को संतुलित करेगा?

हम शायद इस गंभीर स्थिति का गंभीरता से विचार ही नहीं कर रहे।
या, शायद हम समस्या पर तो विचार करते हैं लेकिन समस्या के समाधान पर कोई विचार नहीं करते, समस्या के निवारण की दिशा में कोई कदम नहीं उठाते!

जब भी इस तरह की रिपोर्ट्स आती हैं हम सरकार, प्रशासन आदि पर दोष मढ़ते हैं, और अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। इसी तरह, सरकारें, प्रशासन आदि भी कुछ कागज़ी कार्यवाही करते हैं, कुछ चाय-बिस्कुट वाली मीटिंग करते हैं, और बहुत हद तक ज़िम्मेदारियाँ एक-दूसरे पर डालकर संतुष्ट हो जाते हैं।
लेकिन ठोस कदम हमें खुद उठाने हैं, ऐसा विचार ही नहीं कर पाते।

अपने आसपास नज़र घुमाइए तो नज़र आएगा कि जिन स्थानों में पहले कभी हरियाली थी भी, वह हरियाली आज वहाँ से नदारद है। हमें पता ही न चला कब हमारे आसपास के पेड़-पौधों को हमारा ‘तथाकथित विकास’ निगल गया।

बचपन में किसी अच्छे शासक की नगर-व्यवस्था पढ़ते थे तो उसमें मोटे अक्षरों में लिखा होता था, ‘चौड़ी सड़कें, सड़कों के किनारे-किनारे पैदल चलने के लिए फुटपाथ और फुटपाथ के साथ बड़े-छायादार वृक्ष’। आज हमारे पास सड़कें हैं, फुटपाथ हैं, और उन सड़कों पर दौड़ने वाली बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ भी हैं। लेकिन छायादार वृक्ष कहीं गायब हो गए।

क्या पेड़ लगाना इतना कठिन काम है कि हमें उसके लिए सरकारों की मदद चाहिए? और सरकारों के लिए भी, क्या पेड़ लगाना इतना कठिन है कि उनपर लंबी-लंबी कागज़ी कार्यवाहियाँ होंगी, सभाएँ होंगी, विचार-विमर्श होंगे, लेकिन निर्णय नहीं लिए जा सकेंगे?

आज घर से बाहर निकालिए तो ध्यान दीजिये क्या हर पचास से सौ मीटर की दूरी पर कोई छायादार पेड़ मौजूद है? नहीं न? क्योंकि यदि होता तो आप प्रदूषण के घेरे में न होते। कोई इस तरफ़ कदम नहीं बढ़ा रहा तो आप ही क्यों नहीं कुछ करते? अपने घरों के आसपास, मोहल्लों और कॉलोनी में वृक्षारोपण का दायित्व फिर उस वृक्ष को पानी देकर पोषित भी करते रहने की ज़िम्मेदारी तो हममें से सभी उठा सकते हैं। अकेले नहीं कर सकते तो कुछ मित्रों के साथ ग्रुप बनाकर ही ऐसे काम को अंजाम दे सकते हैं।

क्या एक वृक्ष लगाना इतना महँगा है कि हम उसका खर्च नहीं उठा सकते?

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