बचपन का स्वाद

‘ये क्या हैं? रुई जैसे मुलायम… गुलाबी सपनों से मनोहारी… इतने बड़े लॉलीपॉप? रुई के लॉलीपॉप?’ मेरा बालमन उन रुई के गुलाबी फाहों में बँधने लगा था।

बूढ़े काका के एक कंधे पर, प्लास्टिक से ढंके हुए, गुलाबी रुई के ढेर सारे फाहे… एक-एक स्टिक में एक ही आकार में बंधे हुए, बहुत सारे… और उनके दूसरे हाथ में छोटी सी घंटी। किसी से पूछती, इससे पहले ही बूढ़े काका के हाथ की घंटी बजी और बड़े सुरीले अंदाज़ में उनकी आवाज़… ‘गुड्डी के बाल वाला… बुड्ढी के बाल…’ और मोहल्ले के दूसरे बच्चे  बूढ़े काका को घेरकर खड़े हो गए।

‘एक मुझे, एक मुझे…’ के शोर ने बूढ़े काका पर मानो धावा ही बोल दिया। वह सबको चुप कराते, एक-एक को एक-एक स्टिक थमाते जा रहे थे, और बच्चे उनकी सिलवटें पड़ी हथेली पर एक-एक चवन्नी रखते जा रहे थे।

मुझे भी एक चवन्नी चाहिए थी। लेकिन उससे पहले यह जानना था कि ये बुड्ढी के बाल हैं या गुड्डी के! बुड्ढी के बाल कैसे खा सकते हैं? दौड़कर माँ से चवन्नी माँगने गई, लेकिन पहले पूछ बैठी, “बाहर एक काका बड़े सुंदर रुई के लॉलीपॉप बेच रहे हैं। क्या है वो?

“बुड्ढी के बाल वाला होगा”, काम में व्यस्त माँ ने लापरवाही से जवाब दिया।

“गुड्डी के बाल या बुड्ढी के?”

“बुड्ढी के बाल कहो, या गुड्डी के। एक ही बात है।” माँ अब भी अपने काम में अधिक व्यस्त थीं, मेरे सवालों की गंभीरता उन्हें समझ ही नहीं आ रही थी!

“बुड्ढी के बाल कैसे खा सकते हैं?’ अपने सवाल की गंभीरता से मेरा ही मन बैठने लगा।

कितने सुंदर, गुलाबी फाहे हैं! बुड्ढी के बालों से बनाए? इसे कैसे खा सकते हैं? लेकिन बुड्ढी के बाल तो सफ़ेद होते हैं, ये गुलाबी कैसे हो गए? बालमन इतना तर्कशील? होना तो नहीं चाहिए… लेकिन कभी-कभी बाल-तर्क में ही ज़िन्दगी के कितने अबूझे सवालों के जवाब मिल जाते हैं।

खैर, उस समय मेरा मन बस अपने ही सवालों में उलझा था। लेकिन अब तक माँ ने मेरे सवालों की गंभीरता पर ध्यान दिया, और जवाब मिला, “किसी के बाल से नहीं बना है। बस, नाम है… चीनी से बनता है।”

“अच्छा!” फिर तो मैं चहक उठी “मुझे भी खाना है।” और माँ से चवन्नी लेकर बाहर की ओर तेज़ी से भागी। हाथ में गुड्डी के बाल लेकर देखती ही रह गई। कितने सुंदर हैं ये! मुलायम, फूल जैसे! इन्हें खा लेंगे तो ये ख़त्म हो जाएँगे! सोच ही रही थी कि देखा दूसरे संगी-साथी उसे खाने का आनंद ले रहे थे।

मैंने भी धीमे से उसे चखा, और उसका स्वाद मानो मुँह में घुल गया। जितना सुन्दर, उतना स्वादिष्ट… मुलायम, मीठा… गुड्डी का बाल।

फिर तो लगभग रोज़, हमारे बचपन के साथी बन चुके थे ये गुड्डी के बाल… इनके गुलाबी, मीठे स्वाद में रचा बसा बचपन… आज भी मन को गुलाबी और नरम बनाता है… भले ही, वह स्वाद… अब नहीं आता… जाने क्यों!

Picture Credit: Ameya Bhalerao

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