भागाकार – विभाजित हम

कितनी ही वारदातों में पड़ोसियों की लड़ाई आसमान तक को हिला देती है...
एक ही क्षेत्र में रहने वाले क्यों एक-दूसरे से झगड़ पड़ते हैं?
क्षेत्रवाद याद रखकर प्रेम से क्यों नहीं रहते?
 
रिश्तेदार एक-दूसरे से अक्सर यूं भिड़ पड़ते हैं,
मानो एक-दूसरे के जानी-दुश्मन हों!
आखिर तो वे एक ही जात-बिरादरी के होते हैं!
उनपर जातवाद या सम्प्रदायवाद का कोई असर क्यों नहीं होता?
 
प्रेम, सौहार्द्र और अपनेपन की खातिर
न जातवाद याद रहता है, न सम्प्रदायवाद,
और न ही क्षेत्रवाद याद रहता है।
लेकिन झगड़ने के लिए क्यूँ उलझ पड़ते हैं
कभी जात-पांत के नाम पर तो कभी धर्म-सम्प्रदाय और कभी क्षेत्रवाद के नाम पर?
 
सोचा है, यूँ अपना चैन खोकर हम खुद अपना ही कितना नुकसान करते हैं?
अपनी शक्तियों को व्यर्थ ही झगड़े-झंझट में गँवा देते हैं...
कितने ही अपनों को दुश्मन बना बैठते हैं...
खुद अपने ही हाथों जवान-होनहार बच्चों की बलि चढ़ा देते हैं...
और, अपने ही देश-समाज का सुनहरा भविष्य दांव पर लगा देते हैं!

2 thoughts on “भागाकार – विभाजित हम”

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