माँ की स्मृतियाँ

हर कहानी के पीछे एक कहानी होती है...

जब मैंने 2011 में अपनी अंतिम डाक्यूमेंट्री फ़िल्म (फ़िल्म्स डिवीज़न के लिए शहीद मदन लाला ढींगरा) बनाई, तब तक इस काम से कुछ समय अवकाश लेने का मन बना चुकी थी। लेखन जारी रखा... और इसी समय एक उपन्यास की शुरुआत की। इससे पहले उपन्यास लिखा न था, इसलिए घर में केवल पति और बेटे को पता था, बाक़ी सभी से छुपाया... सखी सरीखी माँ से भी, जिनसे मैं लगभग सभी बातें, सभी अनुभव साझा करती थी।

जुलाई, 2013 में मेरे पहले उपन्यास, “स्मृतियाँ” का विमोचन हुआ, और उसी दिन घर-परिवार के सभी लोगों को पता चला कि मैंने उपन्यास लिखा... सभी की कुछ न कुछ प्रतिक्रिया आई... और सभी ने पढ़ने की इच्छा जताई। माँ ख़ुद हिंदी साहित्य की लेक्चरर रही थीं, तो स्वाभाविक है, उन्होंने बहुत चाव से पढ़ा...

अब तक मैं अपने दूसरे उपन्यास "आतंक के साए में" पर काम शुरू कर चुकी थी। तो माँ के साथ न केवल ‘स्मृतियाँ’ पर चर्चा होती, बल्कि आगामी उपन्यास की कथावस्तु पर भी चर्चा होती रहती... और, बारबार उनका यही सुझाव होता कि दर्द न लिखो... दर्द तो दुनिया में यूँ भी बहुत है! कुछ ऐसा लिखो, कि पढ़ने के बाद मन उदास न रहे! (हाल ही में प्रकाशित उपन्यास “खट्टी मीठी सी ज़िन्दगी” उनके इसी सुझाव को ध्यान में रखते हुए लिखी...)

किन्तु, 2015 में “आतंक के साए में” के विमोचन के समय तक अचानक उनकी सेहत डगमगाने लगी थी... और सूचना पाकर जब मैं उनसे मिलने पहुंची, तब तक वे इतनी स्वस्थ नहीं रही थीं कि उपन्यास पढ़ सकें... पुस्तक की प्रतियाँ जैसे लेकर गई थी, वैसे ही लिए वापस आ गई थी... डॉ ने बहुत दिनों का समय नहीं दिया था... मैं और मेरी दीदी, दोनों एक-एक करके उनसे मिलने जाते रहे... और आख़िरी बार जब मैं उनके पास से वापस आई, तो दो-तीन दिन भी नहीं बीते होंगे, जब 30 जून की सुबह 5:30 के आसपास दादा का फ़ोन आया और बताया कि माँ नहीं रहीं! उस दिन भी प्रदोष था... (आज भी प्रदोष है)

तब से अक्सर महसूस होता है, जैसे कहीं गई नहीं, हम सबके आसपास ही कहीं मौजूद रहती हैं... और कभी-कभी यह सब केवल कल्पना ही लगता है!

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