मिट्टी के खिलौने

मिट्टी के खिलौने

 

छोटी थी, बहुत छोटी... और अपने छोटे-छोटे दोस्तों के साथ खेलते-कूदते चली जाती थी घर से सौ-पचास कदम की दूरी पर कल्याणी-देवी मंदिर परिसर! मंदिर के सामने पार्क में झूले झूलती, और मन्दिर के अन्दर जाकर माँ को प्रणाम भी करती... जाने क्या भक्ति रही होगी उस उम्र में, यह तो पता नहीं, लेकिन जाती ज़रूर थी! और साथ ही, माँ के सामने विराजे शेर की सवारी भी कर आती थी।

साथ ही, याद आते हैं वे छोटे-छोटे मिट्टी के खिलौने, जो मंदिर के बाहर लगी दूकानों में सजे होते थे! चमकीले रंगों में रँगे चूल्हे, कढ़ाही, बर्तन... टी-सेट, डिनर-सेट... और जाने कैसे-कैसे रंग-बिरंगे छोटे-छोटे बर्तन! इनमें से कुछ हमारी चवन्नी से खरीदे जा सकते थे.. लेकिन कुछ हमारे जेब-खर्च के हिसाब से बहुत मँहगे होते थे!

इन्हीं महँगे वाले खिलौनों में से बड़े प्यारे लगते थे वो बैठे हुए, गोल-मटोल से दादा-दादी, जिनके सफ़ेद बाल और रंग-बिरंगी साज-सज्जा बहुत लुभाती थी! स्प्रिंग लगे सिर हिलाते दादा जी की सफ़ेद धोती, रंगीन कुर्ता, आँखों पर गोल-गोल ऐनक, सोने की चेन और (शायद) एक छड़ी भी, पाँव में काली जूतियाँ और साथ ही पान-रचे होंठ... उस उम्र में कितने जीवंत लगते!

और दादा जी की तरह ही सिर हिलाती दादी जी की सुनहरी किनारी वाली लाल साड़ी, बड़ी सी लाल बिंदी, कानों में सुनहरी झुमकी, गले में सोने का हार, लाल-सुनहरी चूड़ियों से सजी कलाइयाँ, काजल लगी जीवंत-सी आँखें और लाल-लाल होंठ!

उस उम्र में मिट्टी के सबसे बेशकीमती खिलौने मेरे लिए यही होते! हर बार जब भी वहाँ जाती, बड़े अरमानों से उन दोनों बुड्ढे दादा-दादी को सिर-हिलाते देखती! लेकिन बस एक बार ही कीमत पूछकर रह गई... जानती थी, मेरे जेब-खर्च से ये कभी खरीदे नहीं जा सकते!

अब सोचती हूँ, बच्चों को यूँ लुभाने वाली हाथों की कलाकारी करने वाले कलाकार कौन रहे होंगे?

दीपावली की खरीददारी करते समय कभी-कभी ऐसी मूर्तियाँ अब भी नज़र आ जाती हैं! पर जाने क्यों, वो बचपन वाला आकर्षण इन मूर्तियों में नहीं... या फिर मेरी नज़रों में न रहा?

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