वसंतोत्सव – प्रकृति दर्शन (लेख)

वसंतोत्सव

जब घने कोहरे को चीर सूरज चुपके से आँगन में उतरने लगता है, जब शीत से ठिठुरते पौधे फिर से चमकने-दमकने लगते हैं, जब कुम्हलाती पत्तियों में फिर से रंग भरने लगते हैं, जब रंग-बिरंगे पुष्पों से बाग़-उपवन खिल उठते हैं, भौरों की गुनगुन जब पायल की रुनझुन सी झनक उठती है, कोमल सपनीली तितलियाँ जब मन-सी मचल उठती हैं, वृक्षों में नई, नाज़ुक कोपलें फूटने लगती हैं, जब खेतों में पीली सरसों लहलहा उठती है, चिड़ियों की चहक से आकाश गूँज उठता है और मानव-मन रह-रहकर झूम-झूम उठता है… सर्द ठिठुरती ठण्ड से बच निकलता मौसम शीत की चादर खोल अंगड़ाई लेकर जागता है, तब दबे पाँव प्रकट होता है ऋतुराज वसन्त!

कहते हैं बाहरी वातावरण का हम प्राणियों के शरीरों पर ही नहीं मन-मस्तिष्क पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। जहाँ सावन-भाद्रपद की वर्षा में हम थिरक उठते हैं, पौष और माघ की ठिठुरती सर्दी में दिल भी ठिठुरने लगते हैं, ज्येष्ठ और आषाढ़ की तप्त उष्णा हृदय तप्त कर देती है तो ऋतुराज वसंत के आगमन के साथ ही प्राणियों के हृदय नव-कुसमित पुष्पों की तरह पल्लवित हो उठते हैं।

प्रकृति का नव-सृजन प्राणियों को मानो प्रेरित करता है। सृजन की इस ऋतु की मनभावन सुन्दरता का वर्णन युगों-युगों से कवियों के शब्दों में, चित्रकारों की तूलिका में और गायकों के सुरों में मिलता है। महाकवि कालिदास ‘ऋतु-संहार’ में कहते हैं-

द्रुमा सपुष्पा: सलिलं सपद्मं स्त्रियः सकामाः पवन: सुगंधि:।

सुखा: प्रदोषा दिवासश्च रम्या: सर्वप्रियं चारुतरं वसन्ते॥

वसंत ऋतु की मनभावन सुन्दरता को शब्दों में उकेरते हुए कवि कहते हैं, ‘प्रिये, जिधर देखो मनमोहक वातावरण है। वसंत के आते ही वृक्ष फलों से लद गए हैं। जल में कमल खिल गए हैं, स्त्रियाँ अपने प्रियतम से मिलने को उत्सुक हो गई हैं, पवन सुगंधपूर्ण हो गया है। संध्या सुहावनी हो गई है। दिन आकर्षक लगते हैं। वसंत ऋतु के आगमन से सृष्टि में चहुँ ओर सुन्दरता बढ़ गई है।

वहीं, जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में श्रद्धा को वसंत-दूत का ही नाम दे दिया है,

कौन हो तुम बसंत के दूत?

विरस पतझड़ में अति सुकुमार

घन तिमिर में चपला की रेख

तमन में शीतल मंद बयार।

और, सुमित्रानंदन पंत ने प्रकृति का मानवीकरण मनभावन शब्दों में चित्रित करते हुए कहा है, ‘दो वसुधा का यौवनसार, गूंज उठता है जब मधुमास।’

सृष्टि के सर्जक ने भारतीय प्रायद्वीप को अन्यत्र दुर्लभ छः ऋतुओं से सुशोभित किया – ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शीत और वसंत। ठिठुरती सर्दियों में जब प्रकृति के अंग-अंग हिम से जमने लगते हैं, तब वसंत ऋतु का आगमन मानो उनमें नव-प्राण का संचार करता है।

यह ऋतु कवि हृदय को नव-रचनाओं के लिए प्रेरित करती है, चित्रकारों की तूलिकाओं में नव-रंग भरती है, गीतों को नए सुर मिलते हैं और नव-संगीत पर प्राणी-मात्र थिरक उठते हैं। युगों से भारतवर्ष में वसंतोत्सव मनाने की प्रथा रही है। माह पर्यंत चलने वाले इस उत्सव का शुभारंभ वसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती की आराधना के साथ होता है।

‘वर दे, वर दे, वर दे… वीणावादिनी वर दे…

प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव भारत में भर दे…’

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की लयबद्ध पंक्तियों पर थिरकती बालिका के चित्त में अक्सर प्रश्न उठता, क्यों नव-सृजन के इस मधुमास के आयोजन का आरंभ विद्या की देवी की आराधना से होता होगा?

भारतीय संस्कृति के इस आयोजन से उठे प्रश्न का उत्तर संस्कृत के एक श्लोक में मिलता है-  

“विद्या ददाति विनयम्, विनयाद्याति पात्रताम्।

पात्रत्वाद्धनमाप्नोति, धनाद्धर्मं ततः सुखम्।।”

यानी, विद्या से विनय प्राप्त होता है, विनय से पात्रता (योग्यता), पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख की प्राप्त होती है!

ध्यान से देखें तो इस श्लोक में एक निश्चित क्रम दिया हुआ है – विद्या – विनय – योग्यता – धन – धर्म और अंत में सुख। मान सकते हैं कि इस क्रम का पालन करने के साथ प्राचीन भारत में लोग संपन्न भी रहे होंगे और सुखी भी!

किन्तु समय के साथ, जैसे-जैसे विविध संस्कृतियों का समावेश हुआ, वैसे-वैसे विचारधारा संक्रमित होने लगी। फलस्वरूप, जाने कहाँ से यह विचार उपजने लगा कि ‘जहाँ विद्या, वहाँ धन नहीं’… ‘लक्ष्मी-सरस्वती साथ वास नहीं करतीं..’

स्वाभाविक है कि मनुष्य को जीवन-यापन के लिए धन अनिवार्य लगा और मूलभूत आवश्यकताओं के वशीभूत मानव-मन इस क्रम को तोड़ने लगा… बिना सरस्वती की आराधना किए, केवल लक्ष्मी को महत्त्व देने लगे और स्वयं ही अपने दुःख, असंतोष और संताप का आरंभ किया। विचारा ही नहीं कि अविद्या के साथ धनार्जन कितने दिनों तक टिक सकता है?

यों तो विद्या से विनय आता है। लेकिन जब विद्या केवल कुछ ही लोगों तक सीमित होने लगी तो उनमें ज्ञान का अहंकार उपजने लगा और वे ‘अविनयी’ बनकर ‘तथाकथित बुद्धिजीवी’ का दर्जा पाने के लिए विचित्र सी होड़ करने लगे! एक और क्रम तोड़ा, एवं कुछ और दुखों को आमंत्रित किया। यही नहीं, धन आया तो धर्म भूल गए, और अधर्म की राह पर अपने साथ-साथ समाज के लिए भी कष्ट और दुखों के द्वार खोले।

संभवतः यही कारण रहा होगा कि वसंतोत्सव के शुभारंभ पर समस्त विद्याओं की देवी, माँ सरस्वती की आराधना की जाती रही है, जिससे मानव मन संतुलित रहे, और न केवल सही क्रम में अपने उद्यम करे, बल्कि वसंतोत्सव के उल्लास में अपना विनय, विनम्रता एवं विवेक बनाए रखे।

हमारी प्राचीन संस्कृति में वसंतोत्सव के आयोजन के प्रचलन के युग बीत चुके हैं, और आज संयोग से, या सोच-समझकर, विदेशों से वसंत ऋतु के दौरान ही फरवरी माह में 14 दिनों तक वैलेंटाइन डे का उत्सव मनाने का चलन शुरू हो गया है। हम विरोध भी कर सकते हैं और स्वीकार भी कर सकते हैं – यह हमारा निजी चुनाव होगा। जो भी हो, दोनों के बीच अत्यधिक समरूपता देखने को मिलती है। हाँ, सत्य है कि वैलेंटाइन के अवसर पर माँ सरस्वती की आराधना नहीं होती। जहाँ वसंतोत्सव में महिला पुरुष रस-रंग के बीच अपनी विभिन्न कलाओं का प्रदर्शन करते थे, कहीं संगीत, नृत्य की प्रतियोगिताएँ होती थीं, तो कहीं चित्रकलाओं की, वहीं वैलेंटाइन का आयोजन बेहद निजी होता है। इसमें किसी प्रकार की कलाओं की स्पर्धा नहीं होती, और आयोजन बस दो लोगों के बीच ही सीमित रह जाता है।

मैं ग़लत हो सकती हूँ, किन्तु ऐसा ही महसूस होता है कि यदि वैलेंटाइन के आयोजन को प्राचीन वसंतोत्सव का आधुनिक रूप माना जाए, तो यह उसका ‘संस्कृति से दूर’ और थोड़ा स्वार्थी रूप ही माना जाएगा, जो चित्त में अनेक प्रश्न उत्पन्न करते हैं –

प्रेम कब से गुलाब, टेडी या चॉकलेट का मोहताज होने लगा..

यह तो आँखों के रस्ते न जाने कब और कैसे

दिल में उतर जाता है…

और…

बहुत कुछ कहा-अनकहा ही रह जाता है!

यह तो संगीत की मधुर धुन की तरह कानों में गुनगुनाता है

ढोल की ताल पर मदमस्त थिरकता है

लेकिन कुछ बेचता नहीं,

कुछ खरीदता भी नहीं!

बस दिल में उतर जाता है…

रिश्तों की सौदेबाज़ी में यह ख़ुद को समेटता नहीं!

जहाँ लेनदेन होता है, वहाँ प्रेम कहाँ होता है?

प्रेम तो भावनाओं का शुद्धतम स्वरूप है,

जो बस, दिल में उतर जाता है! वहीं घर कर जाता है!

प्रकृति दर्शन – लेख

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