शिक्षक दिवस – 5 सितंबर

शिक्षक दिवस-

मेरी समझ के कुछ बिखरे मोती...

 

कुछ शिक्षा पद्धति की दरकार है तो कुछ ज़माने का दस्तूर... कुछ हम बदले तो कुछ हमारे यहाँ शिक्षक बदल गए।

दोष किसे दे सकते हैं? सिस्टम को? लेकिन उसे भी तो हम ही बनाते हैं। जब बच्चों के मुँह से अपने शिक्षकों के लिए अपमान-जनक भाषा सुनाई देती है, तो मन असमंजस में पड़ जाता है-- इसके लिए दोषी कौन?

क्या वे माता-पिता जो बच्चों के सामने उनके शिक्षकों को कोसते हैं?

या फिर वे शिक्षक जो पक्षपात करके बच्चों के कोमल मन में विष घोलते हैं?

या फिर वे शिक्षक जो कोचिंग/ ट्यूशन के लिए मजबूर करके खुद अपने विद्यार्थियों की नज़रों में ही गिरते हैं?

या फिर वे जो हर दूसरे क्षेत्र में नाक़ामयाब हो जाने के कारण मजबूरी में शिक्षक बन गए? या, बस टाइम पास के लिए?

या वे जो बच्चों के गुणों को प्रोत्साहन से निखारने के बजाए उन्हें हतोत्साहित करते हैं?

या फिर उस प्रशासन को दोष दिया जाए जिसने पहले शिक्षकों को “दो-कौड़ी” का बना दिया, और फिर कुंठित करके उन्हें पैसा छापने की मशीन बना डाला?

वजह एक नहीं हैं... दोष भी केवल एक का नहीं!

पर सुधार बहुत ज़रूरी है... कुछ हमारे रवैये में, कुछ प्रशासन में और कुछ हमारे शिक्षकों के नज़रिए में भी!

शिक्षा मानव समाज की नींव है। यह हमारे सोच के दायरे को बढ़ाती है। व्यक्तित्व को निखारती है। जिसके लिए उचित मार्गदर्शन बेहद ज़रूरी है।

हाँलाकि सच यह भी है, कि हम खुद ही अपने शिक्षक होते हैं। जितना कुछ सीखना, समझना चाहेंगे, जितनी कोशिश करेंगे... सीख ही लेंगे। लेकिन उस चाहत को भी जो एक दिशा देने का काम करे, वही शिक्षक है।

बचपन में देखा-सुना था, प्रयासरत शिक्षक अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए एक दिन पहले होम-वर्क करके स्कूल/कॉलेज जाते थे। आज के जागरूक शिक्षार्थियों के सामने शिक्षकों को और भी अधिक तैयारी की ज़रुरत होती होगी। थोड़ी तैयारी पाठ्यक्रम की और थोड़ी अपने स्वभाव-व्यवहार की भी... ज़रूरी है।

जीवन लगातार सीखते रहने की प्रक्रिया है। यों तो ज़िन्दगी में जाने कितने अनुभव, कितने लोग, कितने तरह की शिक्षाएँ रोज़ ही दे जाते हैं... हर घड़ी, हर पल, पग-पग पर एक शिक्षक जीवन का कोई न कोई पाठ पढ़ा जाता है।

लेकिन एक सुलझा हुआ शिक्षक परिपक्व मार्गदर्शक बन हमारी उन सारी सीखों को व्यवस्थित करता है... बिखरी हुई अनगिनत मोतियों को माला में पिरो देता है।

सीख देने की गुस्ताख़ी नहीं, बस विनम्र सुझाव है... क्या शिक्षक अपने शिक्षार्थियों के दोस्त, मार्गदर्शक और अभिभावक नहीं बन सकते?

बच्चों और उनके माता-पिता से भी अनुरोध हैं... आपके व्यक्तित्व में, प्रोफ़ेशनल जीवन में, शिक्षकों का बहुत बड़ा योगदान है... उसका सम्मान करें!

और फिर मनाएँ “शिक्षक दिवस”

मूल रूप से शिक्षक, देश के प्रथम उप-राष्ट्रपति और द्वित्तीय राष्ट्रपति, डॉ एस. राधाकृष्णन के जन्म-दिवस पर सभी शिक्षकों और उनके शिक्षार्थियों को बहुत बहुत बधाई!

“हैप्पी टीचर्स डे”

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