“परमाणु – द स्टोरी ऑफ़ पोखरण” – फ़िल्म

परमाणु –

द स्टोरी ऑफ़ पोखरण

फ़िल्म के विषय में लगातार सुन रही थी। अवसर मिला, तो देखने भी चली गयी।

फ़िल्म की कहानी के विषय मे क्या कहूँ? सभी जानते हैं कि यह वास्तविक घटना की फ़िल्मी प्रस्तुति है। जिसे बहुत ही सशक्त और जीवंत रूप में फ़िल्माया गया है। पात्रों ने अपने चरित्रों को बखूबी जिया है... ऐसे कि कई बार लगा कि हम सचमुच पोखरण की रेतीली भूमि पर पहुँच गए। ऐसे दुष्कर स्थानों पर हमारे जवान हर वक़्त डटे रहते हैं, ताकि हम अपने घरों में चैन से सो सकें!

अंकल सैम की नज़रों से बचते हुए पोखरण परमाणु परीक्षण के लिए जिस तरह से ‘ब्लाइंड स्पॉट’ का उपयोग किया गया, वह चमत्कृत करता है... रियल लाइफ़ में भी, कि इतना दुष्कर काम कैसे किया गया होगा; और फ़िल्मांकन में भी... कि रेतों के बीच बंजर पौधों को लगाना भी नहीं भूले।

ज़िंदगी सचमुच बहुत बारीकी चाहती है!

जॉन अब्राहम ऐसी भूमिका में काफ़ी आकर्षक लगते हैं, और हिमांशु शुक्ला के रूप में बोमन ईरानी तो कमाल करते ही हैं। सभी पात्र सशक्त ही नहीं जीवंत भी लगते हैं।

टीवी पर महाभारत देखते समय चप्पल बाहर उतारने की बात जैसे कुछ सहज दृश्य स्वाभाविक हास्य उत्पन्न करते हैं।

फ़िल्म देखते समय बहुत सी अनुभूतियों से गुज़री। यहाँ मैं उन्हीं अनुभूतियों की चर्चा करना चाहती हूँ।

पहली - यह केवल बीस वर्ष पुरानी घटना है, और हममें से अधिकाँश के मन से उतर चुकी है! क्यों?

क्या कारण हो सकते हैं कि हम केवल बीस वर्ष पहले अर्जित की गयी अपनी एक विकट कामयाबी को याद न रख सके? उससे जुड़ी विफलताओं और उनके कारणों को न जान सके?

हम कैसे नहीं देख सके कि इस दुष्कर सफलता को पाने से पहले अपने-अपने क्षेत्रों के कितने दिग्गजों ने लगातार कितनी मेहनत की, कठिन परिस्थितियों में जिए, मुश्किलों का सामना ही नहीं किया, बल्कि असफलताओं को भी जिया...

और, अंततः पूरी दुनिया को अपनी सफलता से चमत्कृत कर दिया!

कहानी नहीं! हमारे सामने जीवंत उदाहरण है कि ज्ञान के साथ यदि सच्ची लगन और एकजुट मेहनत का तड़का लगाया जाए तो तमाम कठिनाइयों और असफलताओं के बाद भी सफलता मिलती ही है।

मन अटका उस बात पर कि कैसे किसी युवा के विचारों को ऊँचे ओहदों पर बैठे महानुभाव हँसी में उड़ा देते हैं!

यही अहम् है, जो हमारे सामाजिक, राष्ट्रीय और व्यक्तिगत विकास में भी बाधक होता है। सीखने को तो आप चींटी से भी सीख सकते हैं, लेकिन नीयत होनी चाहिए, न कि अहम्!

जब अनुभव और युवा विचार मिलकर काम करते हैं तो तरक्की सुनिश्चित होती है... घर-परिवार में भी और समाज और राष्ट्र की भी।

साथ ही, एक बात और, जो अपने युवाओं के लिए खासतौर पर कहना चाहती हूँ... लेक्चर नहीं, बस उदाहरण है- यदि ज़िन्दगी की परीक्षा में असफल हो जाओ, तो इस पर ज़रूर विचार करना...

पोखरण में एक ही योजना थी, लेकिन एक बार बुरी तरह से असफल हुए, और दूसरी बार चमत्कृत करने वाली सफलता मिली।

अंतर केवल यह, कि पहली बार जल्दबाज़ी में, आधी-अधूरी तैयारी के साथ, आधे ज्ञान के साथ आगे बढ़े, और औंधे मुँह गिरे।

लेकिन फिर प्रयास किया गया।

अगली बार पूरे ज्ञान, पूरी तैयारी के साथ धैर्य से आगे बढ़े, काम से जुड़ी हर बारीकी को ध्यान में रखा, और सफल हुए।

अंत में, मुझे कई बार लगा कि फ़िल्म को बारीकी से समझने के लिए शायद इसे दोबारा देखना होगा!

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परमाणु – द स्टोरी ऑफ़ पोखरणफ़िल्म के विषय में लगातार सुन रही थी। अवसर मिला, तो देखने भी चली गयी।फ़िल्म की कहानी के विषय...

Posted by Garima Sanjay on Wednesday, June 6, 2018