मेरा बच्चा!

साप्ताहिक कहानियाँ – 08 – 28 जून, 2026

‘मेरा बच्चा ऐसा कर ही नहीं सकता, ग़लत बात मत कीजिए मैडम!’

लगभग तीस-चालीस माता-पिताओं और बीस-बाईस बच्चों से भरी कक्षा में एक माँ की आवाज़ गूँजी थी।

‘अपनी कमी छुपाने के लिए मेरे बच्चे पर झूठा आरोप मत मढ़ो, मिस!’

‘बिल्कुल सही कह रही हैं आप! इन टीचर्स से बच्चे सँभाले नहीं जाते और अपनी ग़लतियाँ हमारे बच्चों पर मढ़ देती हैं।’ दूसरी ने साथ दिया था।

‘आपको हम इतनी फ़ीस किस लिए देते हैं?’

‘इसीलिए न कि हमारे बच्चों को सँभालो!’

‘अपना काम सँभालना नहीं आता और हमारे बच्चों पर सारी ग़लतियाँ मढ़ देती हैं!’

उस दिन पैरेंट-टीचर मीटिंग के दौरान कक्षा में उपस्थित सभी माता-पिता के सुर कुछ तेज हो गए थे।

अपनी सीट पर बैठी शिक्षिका आरोपों के घेरे में घिरी कुछ डरी, कुछ सहमी, और कुछ असमंजस में बैठी आरोपों से बचने के उपाय सोच रही थी।

लेकिन उसके पास अपने बचाव के लिए शब्द नहीं थे। कक्षा में रटा-रटाया पढ़ाने के आरोप हों, या बच्चों के बीच भेदभाव और पक्षपात के, सारे आरोप पहले ही उस पर लग चुके थे।

तस्वीर – AI द्वारा निर्मित

बीस-बाईस वर्ष पुरानी घटना आज मानवी के मानस-पटल पर ताज़ी हो गई, जब समाचार मिलते हैं कि किसी युवती ने अपने युवक साथी के साथ मिलकर अपने मंगेतर या नए-नए पति की हत्या कर दी।

या तब भी जब अक्सर समाज में दिखाई देते हैं किसी पब या होटल से निकलते, धुएँ के बीच धुँधलके, नशे में झूमते युवक-युवतियों के चेहरे… …

ये वही चेहरे हैं, जो यह सुनकर बड़े हुए हैं कि ‘मेरा बच्चा तो ग़लत कर ही नहीं सकता!’

ये अपने माता-पिता के इस विश्वास के साथ बड़े हुए हैं कि ‘हम तो कुछ ग़लत कर ही नहीं सकते।’

‘हमें डाँटने वाले ख़ुद डाँट खाने लायक़ हैं।’

यदि समय रहते माता-पिता ने उनकी ग़लतियों पर पर्दा डालने के बजाय एक डाँट लगाई होती, या ‘मेरा बच्चा तो ग़लत कर ही नहीं सकता’ के अंधे भरोसे से ऊपर उठकर यदि बच्चे की गतिविधियों पर निगाह रखी होती, तो संभव है परिस्थितियाँ कुछ अलग होतीं?

… मानवी का निराश मन सोच में डूबा हुआ विचार कर रहा था – ‘और हम उस पीढ़ी से आ रहे हैं जब समाचार पत्रों में कहीं नवविवाहिता के जल मरने, दहेज़ के लिए प्रताड़ित होने, या छेड़खानी और मोलेस्टेशन की घटनाएँ भरी होती थीं।

“क्या यह कुरीतियों एवं अपराधों का फुल-सर्किल है?’

© गरिमा संजय