बाल दिवस – बचपन या केश?

आज बाल दिवस है… बाल मतलब? ज़ाहिर है, बच्चों का दिन! न कि, काले घने, सुनहरे, रुपहले केशों का दिन!

हर भाषा की तरह हिंदी और संस्कृत में भी बहुत से शब्द अनेकार्थी होते हैं। वैसे ही जैसे कोटि का मतलब प्रकार भी होता है और करोड़ भी, और जैसे लिंग का मतलब प्रतीक भी होता है, न कि केवल gender! वैसे अब तक आधुनिक भारत में बहुत से लोग समझने लगे हैं, कि साकार रूप में ही नहीं, शिव को प्रतीक के रूप में शिवलिंग बनाकर भी पूजा जाता है… जो अब भी नहीं समझे, वे सचमुच धन्य हैं!

खैर, हम तो आज बाल दिवस मनाते हैं! वैसे सोच रही थी, बाल – बच्चा और बाल – केश दोनों में बड़ी समानता भी है!

बचपन के रहते उसकी अहमियत, उसकी ख़ूबसूरती समझ में नहीं आती, लेकिन जब यह चला जाता है तो बड़ा याद आता है, और ऐसा ही कुछ केश के साथ भी है! काले घने केश होते हैं, तो आप उन्हीं में उलझे, उनकी अहमियत नहीं समझते… और जब झड़कर सिर पर टकला बनने लगे तो उन्हें बचाने के सारे उपाय करने लगते हैं! लेकिन एक बार गए, तो बस गए! वापस कहाँ आ पाते हैं? न बचपन, और न ही केश!

हाँ, दिलों में बचपना जगाए रखा जा सकता है, लेकिन कितना भी हो, उसमें परिपक्वता की परत चढ़ी ही रहती है! वैसे ही जैसे, बाज़ार में मौजूद तरीक़ों से केश को भी काला-घना बनाया तो जा सकता है, लेकिन रहता तो वह कृत्रिम ही है।

बाल और बाल दोनों पर उनके पूर्वजों, उनके माता-पिता का भी बहुत प्रभाव होता है। दोनों पर वंशानुगत असर होता ही है। प्यार, दुलार और अनुशासन के संरक्षण में देखभाल से पाले-पोसे गए बच्चे भी स्वस्थ और ख़ुशहाल होते हैं, और केश भी स्वस्थ और चमकदार होते हैं।

बचपन भी किसी का सुनहरा तो किसी का रुपहला होता है, तो किसी का बचपन काले-अँधियारों में उलझा भी रहता है! केश भी तो किसी के काले घने होते हैं, तो कुछ के सुनहरे हो जाते हैं… हमारे यहाँ अक्सर कुपोषित बच्चों के केश सुनहरे से दीखते हैं… हालाँकि फ़ैशनपरस्त काफ़ी खर्च करके अपने केशों को सुनहरे रंग देते हैं।

बचपन का रुपहला रंग तो बड़ा ही भाता है, लेकिन जब केश पर चाँदी उतर आए, तो अधिकतर लोगों का दिल बड़ा घबराता है!

वैसे केश की चाँदी छुपाने के बहुत से तरीक़े बाज़ार में मौजूद हैं, और कृत्रिम चाँदी झलकाने के भी बहुत से तरीक़े आ चुके हैं! लेकिन बचपन की चाँदी तो बस उस मासूम सी मुस्कान में ही होती है… जो चाँदी सी उजली होती है, जिनकी आँखों में जगमग सितारे झिलमिलाते हैं, मोतियों की बाढ़ नहीं आने पाती!

अच्छा, उलझने में भी बाल और बाल एक जैसे ही होते हैं! बच्चे उलझ पड़ें तो बड़े-बड़ों की छुट्टी कर देते हैं, कभी-कभी तो अपने सवालों, अपने तर्कों से अपने बड़ों के सिर के बाल उड़ा देते हैं! और केश उलझ जाएँ तो इंसान के लिए मुसीबत ही बन जाते हैं! एक-एक बाल को अलग करना कितना जानलेवा होता है, यह कोई लंबे बालों वाला ही बता सकता है!

वैसे बाल और बाल दोनों ही सेहत भी दर्शाते हैं… एक समाज की तो दूसरी इंसान की! स्वस्थ समाज में बच्चे ख़ुशहाल, खिलते फूलों जैसे होते हैं, जो एक मज़बूत समाज का भविष्य होते हैं।
वहीं, स्वस्थ इन्सान के बाल काले, घने और चमकते से दीखते हैं।

बचपन भी किसी का ख़ुशियों से सघन हो सकता है और किसी का कुपोषित, कमज़ोर ही रह जाता है! जैसे केश भी किसी के काले-घने होते हैं तो किसी के हलके पतले ही रह जाते हैं!

यह बात अलग है कि यदि केश पतले हों तो केवल सौन्दर्य प्रभावित होता है, लेकिन बचपन कुपोषित या कमज़ोर रह जाए तो पूरी एक नस्ल प्रभावित हो जाती है… केवल एक जीवन ही नहीं, उससे जुड़ा समाज प्रभावित हो जाता है।

तो, स्वस्थ जीवन और स्वस्थ समाज के लिए बाल और बाल दोनों का ही पूरा ध्यान रखें…

मन में पलते बचपन का भी ख़याल रखें, और सिर पर उगे केश की भी ख़ूब देखभाल करें…

“शुभ बाल-दिवस”

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