घरौंदे – तब और अब

उधर…

मिट्टी में सने नन्हे-नन्हे हाथ बड़ी तत्परता से व्यस्त थे, गुड़िया-गुड्डे का घरौंदा बनाने में। यमुना जी के किनारे की वो हल्की-लाल मिट्टी जो पानी डालते ही एकदम चिकनी आटे सी गुँथ जाती। मिट्टी सानकर एक-एक कर तीन ओर की दीवार बनाई। पीछे की ओर कमरे, कमरों में खिड़कियाँ, सामने खुले हिस्से में घर का आँगन, और घर के आँगन के एक हिस्से में छोटा सा चूल्हा। लकड़ी के छोटे से पटरे ने घर की छत का काम किया।

फिर से थोड़ी मिट्टी सानी। इस बार और अधिक मेहनत और जतन से दूसरी मंज़िल बनानी शुरू की। छोटे छोटे दो कमरों की खिड़कियों में माचिस की तीलियाँ ऐसे सजाईं मानो लोहे का जंगला हो।

सात साल की गिन्नी के लिए अब सबसे कठिन काम शुरू हुआ। छत पर पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनानी थीं। थोड़ी मिट्टी और सानी, नीचे से पहली मंज़िल तक ढलान वाली चौड़ी सी दीवार बनाई, और इससे पहले कि मिट्टी सूख सके, अपने नन्हें-नन्हें हाथों से सीढ़ियों पर पायदान को आकार देना शुरू कर दिया।

इधर…

उम्र के कई दशक पार करके, बोझिल आँखों के झरोखों से अतीत को झाँकती दो आँखें मुस्करा दीं। मासूमियत के उस दौर में घर के मायने कितने सरल थे, और घरौंदे बनाना कितना आसान!

तस्वीर – गूगल से साभार

#kahaniyan_hindi #shortstories #hindistorytime #storytime

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *