अजात – लघुकथा laghukatha.com

laghukatha.com के नवंबर अंक में मेरी भी एक लघुकथा को स्थान मिला...

 

अजात

अजात
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राधा तेज़ी से फ़्रिज की ओर बढ़ी, काँपते हाथों से फ्रीज़र खोला। मन में घबराहट थी, हाथों में संकोच, फिर भी जल्दी से बर्फ़ की चार-पाँच क्यूब कटोरे में डाली और ऊपर से थोडा ठंडा पानी मिलाया। एक तेज़ नज़र पूरे किचेन में डाली। बाहर बालकनी में सूखने को पड़ी हैण्ड-टावल तक उसकी निगाह पहुँची। तेज़ी से बढ़कर तौलिया उठाया, और सविता के कमरे की ओर बढ़ गई।

पलंग पर अचेत-सी पड़ी सविता का माथा छुआ। आग की तरह तप रहा था। तेज़ बुखार से चेहरा लाल हुआ जा रहा था और हाथ-पाँव जैसे निर्जीव हो रहे थे। काँपते हाथों से राधा ने सविता के माथे पर बर्फ़ की ठंडी पट्टी रख दी।

सविता ने धीमे से आँखें खोलीं। राधा की ओर देखकर बुझी-बुझी सी मुस्कराई, और फिर से अपनी बेजान, निष्तेज आँखों को मूँद लिया।

‘चिंता मत करो, भाभी, बुखार जल्दी उतर जायेगा,’ राधा ने उसे दिलासा देने की पूरी कोशिश की। सविता ने धीमे से उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।

थोड़ी ही देर में बुखार सचमुच उतरने लगा था। सविता को जाने कब नींद आ गई। राधा वहीं उसके पास बैठी रही।

दरवाज़े की घंटी बजी तो राधा ने लपककर दरवाज़ा खोला। देखा सविता का सात साल का ध्रुव स्कूल से लौट आया था। ‘छोटा बच्चा स्कूल से आया है, भूखा होगा’, लेकिन भाभी के किचेन का सामान कैसे छू सकती हूँ! राधा सोच में पड़ गई। सविता के घर पर वह कई साल से साफ़-सफ़ाई का काम करती थी। लेकिन इससे पहले कभी भी उसने उनके घर में खाने-पीने के सामान को हाथ नहीं लगाया था। लेकिन अभी उस छोटे से बच्चे की भूख उससे देखी नहीं जा रही थी।

‘जो होगा, देखा जाएगा! अभी तो बच्चे को कुछ खाने को दे दूँ,’ सोचकर राधा ने झटपट उसके लिए दो परांठे बनाकर अचार के साथ दिए ही थे कि एक बार फिर से घंटी बजी। दरवाज़े पर साहब के साथ उनकी माता जी खड़ी थीं।

देखकर राधा सकपका गई। माताजी की चढ़ी हुई त्योरियाँ देखकर वह धीमे से किनारे हट गई।

माताजी तेज़ी से भीतर आयीं और ध्रुव को परांठे खाते देख पूछ बैठीं, ‘ये परांठे कहाँ से आये, राधा?’

‘मालकिन, बच्चा भूखा था, इसलिए मैंने ही...’ राधा सहमी हुई थी, क्योंकि वह जानती थी कि माताजी की नज़र में उसने क्या पाप किया था। उसके अधूरे वाक्य के साथ ही घर में तूफ़ान आ गया।

‘थोड़ी देर भूखा भी रह जाता तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाता! फेंक ये परांठा। न कुल का पता न जात का! अपवित्र कर दिया बच्चे को! तेरी हिम्मत कैसे हुई किचेन में घुसने की? खाने-पीने की चीज़ को कैसे छुआ भी कैसे?’ माताजी बरस पड़ी थीं। पूरा घर सहम गया था।

‘जाने क्या-क्या छुआ होगा इसने...’ बड़बड़ाती माताजी के सुर तेज़ होते जा रहे थे, ‘अब पूरा किचेन ही धोना पड़ेगा... आटा भी छू लिया... ले जा सारा आटा अपने घर। अशोक, मार्केट से आटे की नयी थैली मंगा। अब मैं बहु का ध्यान रखूँ या इस नौकरानी का?’

नौकरानी की आँखों में कुछ पानी तो कुछ आग थी। एक कोने में खड़ी चुपचाप माताजी को देख ही रही थी कि कंधे पर एक काँपता हुआ स्पर्श महसूस हुआ। मुड़कर देखा तो सविता को देखकर चौंक गई।

‘आप यहाँ क्या कर रही हैं, भाभी? चलिए लेटिये, नहीं तो फिर से बुखार बढ़ जायेगा।’

मन घायल था, फिर भी सविता की बीमारी कैसे नज़रअंदाज़ करती?

सविता भी तो भले ही बीमार थी, आहत राधा को कैसे नज़रअंदाज़ करती?

एक दूसरे को सहारा दिए दोनों सविता के कमरे की ओर बढ़ गयीं। अशोक और माताजी बस चुपचाप उन्हें जाते देखते रहे। नन्हा ध्रुव फिर से अपने परांठे चट करने में जुट गया।

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