अब नहीं तोड़ती पत्थर वह…

घर के आँगन में पत्थर लगने का काम होना था। ठेकेदार से मेरी सारी बातचीत हो चुकी थी। तभी गेट पर साइकिल-रिक्शा में पत्थर भरकर एक लड़का आया, और उसके साथ ही थी चेहरे पर एक सहज मुस्कान लिए, करीने से बंधी साड़ी में लिपटी, एक युवा महिला। इस तरह के सिविल कामों में लेबर के रूप में महिलाओं का काम करना नई बात नहीं। दोनों के सामने ही ठेकेदार से मैंने अपनी ज़रुरत के हिसाब से काम बताया। ढलान किस ओर रखनी है, गेट के नीचे कितनी जगह रखनी है, ताकि गेट अन्दर की ओर आसानी से खुल सके, इस तरह की तमाम बातें मैं ठेकेदार को समझा रही थी। सुनकर, समझकर ठेकेदार हामी भरते हुए उस महिला की ओर घूमा, ‘ठीक है, सीमा? हो जायगा न?’

मुझे थोड़ा विचित्र लगा और थोड़ा अच्छा भी, कि ठेकेदार एक महिला लेबर को इतनी अहमियत दे रहा है! फिर सोचा और ख़ुद ही समझ लिया, ठेकेदार तो अभी चला ही जाएगा। देखने में समझदार लग रही है, सो सीमा ही मिस्त्री को ये सारा काम समझा देगी। अच्छा ही है, मुझे ये सब बातें मिस्त्री को दोबारा समझानी नहीं पड़ेंगी। थोड़ी ही देर में एक और लड़का आया, इस बीच सीमा और रिक्शे वाले लड़के ने मिलकर उन सारे भारी पत्थरों को रिक्शे से उतारकर दीवार के सहारे करीने से सजा लिया था।

नए लड़के के आने पर उसने और सीमा ने मिलकर अपने ही तरीक़े से आँगन की नाप लेना शुरू किया... डोरी की मदद से नाप ली गई, कुछ लिखा-पढ़ी हुई और कुछ चर्चा भी हुई। थोड़ी ही देर में दोनों ने बदरपुर-रेत और सीमेंट में पानी मिलाकर मसाला बनाना शुरू किया, और जल्दी ही नज़र आया कि वे दोनों दो अलग-अलग पंक्तियों में पत्थर जमाने का काम भी शुरू कर चुके थे। देखकर बहुत अच्छा लगा... चाहे ज़मीन की नाप लेकर निशान लगाना हो, सीमेंट का मसाला तैयार करना हो, या पत्थर नापकर सही जगह पर जमाना हो, सीमा उस लड़के से कम काम नहीं कर रही थी।

लंच के बाद काम फिर से शुरू हुआ। इस बार मुझे केवल अच्छा ही नहीं लगना था! इस बार तो मुझे ख़ुशी के साथ हैरान भी होना था! मिस्त्री का काम करने वाला वो लड़का कहीं नज़र न आया। रिक्शे वाला लड़का सीमा की मदद कर रहा था, और वह बड़ी ही तत्परता से एक-एक पत्थर जमाती चली जा रही थी। अब जाकर मैं समझ सकी थी कि इस काम के लिए सीमा ही मिस्त्री थी, बाकी लड़के उसके सहयोगी!

देखकर, समझकर मन में न जाने कितनी-कितनी अनुभूतियाँ, कितने-कितने विचार आते-जाते रहे... पहली बार एक महिला को मिस्त्री का कठोर ही नहीं, स्किल्ड काम करते देख रही थी! उस पर गर्व महसूस हुआ।

‘अब नहीं तोड़ती पत्थर वह! अब तो वह पत्थरों को सजाती है, तत्परता से नाप लेकर ज़मीन पर जमाती है...’

 

वह सीमा मिस्त्री है! जो पत्नी भी है और है ढाई बरस के एक बच्चे की माँ भी! जो स्कूल से आते ही अपनी माँ को फ़ोन करके बताता है कि आज उसने स्कूल में क्या-क्या किया, और बीच-बीच में फ़ोन कर-करके बताता रहता है कि उसने कब क्या खाया, कब सोया और कब दूध पिया! फ़ोन के सहारे वह बच्चे को भी दुलरा लेती है, और फिर से लग जाती है उतनी ही तत्परता से अपने काम में... आँखों में गंभीरता और चेहरे पर मुस्कान लिए!

जितनी बार मैं उसे देखती मुझे बरबस याद आ जातीं निराला जी की पंक्तियाँ!

‘वह तोड़ती पत्थर, देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर...’

सोच रही थी, काश कि आप आज कहीं से देख रहे हों, कविवर! तो आप भी गर्व महसूस करते इस बदलाव पर! और बहुत संभव है कि हमें एक और बेमिसाल कविता पढ़ने को, स्मृतियों में संजोने को मिल जाती... जो बताती... ‘अब नहीं तोड़ती पत्थर वह! अब तो वह पत्थरों को सजाती है, तत्परता से नाप लेकर ज़मीन पर जमाती है...’

मेरे रूखे-सूखे शब्दों में... ‘अब वह लेबर नहीं रही, अब तो वह मिस्त्री बन चुकी है!’

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