शादियों का मौसम

शादियों का मौसम

एक बार फिर शादी का सीज़न चल रहा है! बहुत से लोगों की शादी की सालगिरह भी हो रही हैं… नवंबर दिसंबर में हमेशा ही हमारे यहां बहुत शादियां होती है।

ध्यान दें तो पिछले कुछ दशकों में हमारे यहाँ शादी-ब्याह के आयोजनों में कितना अंतर आ गया है! कुछ लड़के-लड़कियों के रवैये में तो काफ़ी कुछ उनके माता-पिता की सोच और विचार में, कुछ रीति-रिवाज़ मनाने के अंदाज़ में तो कुछ संबंधों को निभाने के तरीक़ों में भी!

बहुत पहले, हमारे बड़े-बुज़ुर्ग बताते थे कि शादी तय करवाने का काम नाऊ करते थे! लेकिन जब नाऊ का दखल घरों में कम होने लगा, तो धीरे-धीरे नाते-रिश्तेदारों ने, जान-पहचान वालों ने यह काम अपने कंधों पर, सहर्ष ले लिया! शादी योग्य दिखने वाले हर लड़के-लड़की पर कुछ ख़ास रिश्ते-नातेदार अपनी पैनी नज़र रखते… मेल भी ऐसा मिलाते कि पूछिए मत! लड़के-लड़की से सहमति माँगी जाती, लेकिन इनकार नहीं सुना जाता! यानी, केवल हाँ सुनने के लिए सहमति ली जाती।

यही लड़के-लड़कियाँ जब ख़ुद माता-पिता बने तो इन्होंने अपने बच्चों से “हाँ” सुनने की ऐसी कोई हठ नहीं की। कई जगहों पर एक नया रिवाज़ पनपने लगा, बच्चों से उनकी पसंद पूछी जाने लगी, और अगर कोई पसंद है तो दोनों ओर के माता-पिता, बड़े-बुज़ुर्ग मिलकर सब तय करने लगे। अगर लड़के-लड़की अपनी पसंद नहीं बताते तो शादी तय करवाने का नाऊ और रिश्तेदारों वाला जिम्मा उठा लिया है शादी.कॉम जैसी वेबसाइट्स ने…

ऐसे ही, पहले जब शादी तय हो जाती थी तो पहले बड़े-बुजुर्ग तैयारियाँ करवाने इकट्ठे हो जाते थे, लड़कियाँ-महिलाएँ तैयारियों के साथ-साथ गाने-बजाने के लिए इकट्ठी हो जातीं। उन्हें लुभाने के चक्कर में कुछ मनचले बहुत सारे काम भी कर डालते थे। अब इतना नहीं होता… अब तो हर काम के ऑर्डर कर दिए जाते हैं… लड़कियों, औरतों की अपनी व्यस्तताएँ हैं… किसी की पढ़ाई तो किसी की नौकरी है, ऐसे में कब और कैसे इकट्ठी होकर शादी के घर का कामकाज संभालें, गाएँ, बजाएँ? अब वे नहीं, तो मनचलों की फ़ौज भी क्या करे? हैं तो वे आज भी, लेकिन डेरा कहीं और ही डालते हैं!

अब तो बस सबके सब शादी-समारोह के समय सजधज कर डिज़ाईनर कपड़े पहनकर पहुँच पाते हैं… सजने-सँवरने के लिए भी अब सब ब्यूटी पार्लर की मदद लेते हैं… लड़कियाँ, महिलाएँ ही नहीं पुरुष भी अब मेन्स पार्लर में सजने-सँवरने पहुँच जाते हैं! पहले तो दुल्हन तक को घर की भाभी, बड़ी बहन वगैरह ख़ुद ही सजा-धजा कर तैयार कर डालती थीं, अब तो घर की छोटी-छोटी बच्चियों को भी ब्यूटीशियन मेकअप का टच देती है!

व्यस्तता के वर्तमान दौर में मैरिज प्लानर का बिज़नेस भी ख़ूब पनपा है, जो हर चीज़ एकदम परफेक्ट, फ़िल्मी अंदाज़ में करवाने की कोशिश में मैनेजर की तरह लगे रहते हैं। मैरिज प्लानर न हों फिर भी, बहुत से काम में तरह-तरह के एक्सपर्ट की मदद ली जाती है… जैसे, उपहारों की पैकिंग प्रोफ़ेशनल करने लगे हैं… वह दूसरा वक़्त था, जब घर पर ही लड़कियाँ-महिलाएँ इकट्ठी होकर हँसी-ठिठोली के बीच सारे उपहार पैक कर डालती थीं। अब किसके पास इतना वक़्त है, कि साथ बैठ ये सारे काम कर सकें?

पहले कम से कम हफ़्ते-दस दिन पहले से शादी के घर में चहल-पहल बढ़ जाती थी। नाते-रिश्तेदार बाहर से आ जाते थे, घर में सभी के खाने के साथ साथ गाना-बजाना भी शुरू हो जाता… घर की कुछ गुणी महिलाएँ ढोलक संभाल बैठ जाती थीं, और उसी की ताल पर बन्नी, बन्ना, और देवी के गीत गाती थीं… आज, पता नहीं लोग ये सब करते-करवाते हैं, या म्यूज़िक सिस्टम के ही भरोसे सारी शादी निपटा देते हैं?

घर की महिलाएँ ख़ुद उठकर बीच-बीच में कड़ाही में कलछी चला आती थीं, तो कभी घर की महराजिन भी उनके बीच आ, कुछ गीत गुनगुना जाती थी!

आज, इतना सब करने की ज़रूरत ही नहीं होती… बहुत सारे लोग अधिक पहले से शादी में शामिल होने आ ही नहीं पाते… न किसी के पास इतना समय… और न ही उन्हें टिकाने के लिए सबके पास इतनी जगह ही होती है! तो अब, एक या दो दिन के लिए कहीं जगह बुक कराई जाती है, घर वाले और मेहमान सभी, सीधे वहीं इकट्ठे हो जाते हैं! कैटरर ऑर्डर पर खाना बना देता है, और अगर होटल में हैं, तब तो और भी सब कुछ रेडीमेड हो जाता है!

हल्दी, मेहँदी, सबकुछ आज भी होता है, लेकिन तरीक़े बहुत कुछ टीवी वाले हो गए हैं… अब हर मौके के लिए थीम होती है… हल्दी पर पीले और मेहँदी पर हरे रंग के कपड़े जेवर पहने जाते हैं।

शौक पहले भी होते थे, और आज भी होते हैं… बस, तरीक़े बदल गए हैं, अंदाज़ बदल गए हैं! रेडीमेड के ज़माने में शादियाँ भी रेडीमेड हो चली हैं।

बहुत कुछ ऐसा लगता है जैसे… पहले बस, मिट्टी के दिए धोकर तेल भरकर दीप जला दिए जाते थे, जबकि आज उन्हीं दीपों को जलाने से पहले उनमें रंग भरकर, सजावट करके, थोड़े सुगंधित तेल भी डालकर तैयार करते हैं।

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