फ़ेयरनेस क्रीम

श्याम रंग दे दे...

(कहानी)

-गरिमा संजय

घने काले लंबे बालों को तौलिये से पोंछते हुए एक बार अपने चेहरे को आईने में निहारा। आँखों से उदासी छलकी जा रही थी। कुछ पल अपलक खुद को देखती रही, और फिर बहुत रोकने के बावजूद उन बड़ी-बड़ी कजरारी आँखों से एक आँसू छलक गया।

उस आकर्षक सुडौल चेहरे पर उन गहरी भावपूर्ण आँखों, तीखी नाक और गुलाब की पंखुरियों से गढ़े हुए होठों के बावजूद आज ये छठीं बार था जब कोई लड़का अपने परिवार के साथ उसे देखने आ रहा था। पिछले पाँच ने उसे रिजेक्ट कर दिया था। क्योंकि उन्हें गोरी सुंदरी से शादी करनी थी। साँवली सलोनी रूपमती, गुणों की धनी उन्हें फबती न थी।

ड्रेसिंग टेबल की दराज से फ़ेयरनेस क्रीम निकालकर अपने चेहरे और हाथों पर रगड़ने लगी।

‘उन अनजान लड़कों और उनके परिवारों को क्या दोष दूँ, जब उस अपने को ही मेरा यह साँवला रूप न भाया,’ काजल के दिल में हूक उठी थी।

रोहन से उसकी दोस्ती कॉलेज में ही हो गयी थी। संयोग से कॉलेज के बाद दोनों की नौकरी भी एक ही ऑफ़िस में लग गयी, और इसके साथ उनकी दोस्ती गहराने लगी। एक साथ लंच करने की शुरुआत के साथ एक साथ ऑफ़िस आना-जाना भी शुरू हो गया। वह समझ ही न सकी कि कब उसे रोहन से प्यार हो गया। रोहन की बातें, उसका साथ, उसकी मुस्कान पर वह अनजाने ही मोहित होती चली गयी। भले ही किसी तरह के प्रेम का इज़हार न रोहन ने कभी किया था, और न ही काजल ने ही उसे कोई संकेत दिया था। लेकिन उनके साथ को तो शायद किसी शब्द की ज़रुरत ही न थी।

भले ही उन्होंने एक दूसरे के सामने अपने प्रेम को न स्वीकारा हो, लेकिन उनका साथ किसी से भी न छुपा था। उन्हें देखकर पूरा ऑफ़िस ही नहीं और मित्र-मंडली में भी सभी समझ रहे थे कि एक न एक दिन इनका प्रेम परवान चढ़ेगा और इनकी शादी की दावत उड़ाने का मौका सबको मिलेगा।

मन के किसी कोने में काजल भी इसी आस को सजाये बैठी थी। कोई सहकर्मी या दोस्त रोहन के नाम पर छेड़ती तो बस लजा ही जाती। कभी सपनों में खो जाती तो कभी कल्पनाओं में... कि कब और कैसे रोहन उसके सामने अपने प्रेम का इज़हार करेगा, और उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखेगा।

रोहन ने तो नहीं, लेकिन उस दिन मम्मी-पापा ने ज़रूर उसके सामने उसकी शादी की बात छेड़ दी।

रात को खाने के बाद जब पूरा परिवार टीवी देख रहा था, तब पापा बोले, ‘बेटा, हम लोग चाहते हैं अब तुम्हारी शादी कर दी जाए।’

मम्मी ने भी पापा का समर्थन किया और साथ ही दोनों ने स्पष्ट कर दिया कि अगर उसकी कोई पसंद हो तो बता दे, वर्ना वे लोग उसके लिए अच्छा लड़का खोजें।

‘मुझे बस कुछ दिन का समय दे दीजिये, सोचकर बताती हूँ,’ कहकर उसने उन दोनों को टाला था। मन में अजब सी अनुभूतियाँ हो रही थीं। समझ नहीं पा रही थी कि वह खुश है या घबराई हुई है। समझ रही थी कि अब उसे खुद ही रोहन से अपनी बात करनी होगी।

‘कैसे कहूँगी, क्या कहूँगी, कैसे बात शुरू करूँगी...’ ऐसी ही उलझनों में सारी रात जागते ही बिता दी। कितनी ही बार कल्पना की थी कि रोहन उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखेगा। इस कल्पना की सारी पटकथा उसने कितनी ही बार तैयार की थी, और कितनी ही बार ख्यालों ही ख्यालों में उस प्रस्ताव को सुनकर कुछ लजायी, कुछ घबराई और ख़ूब पुलकित हुई। लेकिन खुद उसे रोहन के सामने शादी का प्रस्ताव रखना पड़ेगा, सोचकर वह बस घबरा ही रही थी। इस परिस्थिति के लिए वह कभी भी तैयार न थी।

ऑफ़िस जाने के लिए अपनी गली से निकलकर मोड़ तक आयी ही थी कि रोहन की कार उसके बगल में रुकी। रोज़ की तरह उसने अपने बाँई ओर झुककर काजल की तरफ़ का गेट खोला और बैठने का इशारा किया। यह सबकुछ रोज़ ही होता था। लेकिन आज काजल रोज़ की तरह सामान्य न थी।

‘अब तो कुछ ही दिनों में ये सब ऐसे न होगा... कुछ दिनों में हम दोनों एक साथ, एक ही घर से निकलेंगे...’ कल्पनाओं में रोमांचित हो उठी थी।

उसे चुप देख रोहन को थोड़ी हैरानगी हुई। आखिर चार-पाँच वर्षों से दोनों एक दूसरे को जानते थे। काजल इतनी देर तक कभी चुप कहाँ रहती थी? जितनी उसकी आवाज़ में मिठास थी, उतनी खनक भी, और उस खनक को विराम देना तो जैसे वह जानती ही न थी। इसीलिए तो सारे दोस्त उसे चर्पिंग कुकू यानी चहचहाती कोयल कहते थे।

‘क्या हुआ? आज तुम्हारी चपर-चपर बंद है? कहाँ खोयी हुई हो?’

रोहन ने हंसकर पूछा तो मानो नींद से जागी थी। उसे यूं चौंकती देख रोहन हँस पड़ा।

‘अब यार, इतनी पुरानी दोस्ती है हमारी, मुझसे क्या छुपाना?’ रोहन के प्रोत्साहन पर काजल ने अपनी बात शुरू की...

‘वो क्या है न...’ हाँलाकि समझ नहीं पा रही थी कि कहाँ से शुरू करे। संकोच ने उसे बुरी तरह से घेरा हुआ था।

‘अरे, बोलो न!’ रोहन हँसा तो काजल कुछ और प्रोत्साहित हुई।

‘अरे यार! कल मम्मी-पापा मेरी शादी की बात कर रहे थे’ हिम्मत जुटाकर वह एक सांस में बोल गयी।

‘अच्छा? कोई लड़का देखा क्या तेरे लिए? कौन है? क्या करता है?’

रोहन के सवालों पर काजल उसे हैरानी से देखने लगी। कुछ अटपटा सा महसूस हुआ। लेकिन कुछ समझ नहीं पायी, तो संजीदगी से अपनी बात आगे बढ़ाई।

‘ये सब मुझे क्या पता? मैंने तो उनसे यही कहा कि सोचकर बताती हूँ...’

‘सोचकर क्या बताओगी? लड़के के बारे में तो पता करती...’

वह समझ नहीं पा रही थी कि रोहन की प्रतिक्रियाओं का वह क्या मतलब निकाले। कुछ क्षण चुप रही, फिर बोली, ‘रोहन, वे लोग पूछ रहे थे कि क्या मैं किसी को पसंद करती हूँ...’ और खामोश निगाहों से उसकी ओर देखने लगी।

उम्मीद थी, कि अब तो रोहन अपने दिल की बात उससे कहेगा।

‘तो? क्या तुम किसी को पसंद करती हो? बड़ी छुपी रुस्तम हो तुम तो!’

रोहन हँसा और काजल पर जैसे बिजली गिरी हो। पहली बार महसूस हुआ कि रोहन के लिए उसकी भावनाएँ एक तरफ़ा थीं। लेकिन अपनी उस अनुभूति पर जैसे वह विश्वास ही नहीं करना चाहती थी।

ज़ुबान में भले ही बहुत संकोच था, लेकिन फिर भी बोल पड़ी, ‘रोहन! ये तुम पूछ रहे हो? क्या हम दोनों...’

इसके आगे कुछ भी नहीं बोल सकी। शायद ऐसा पहली बार हुआ था कि उसके चहकते गले ने उसका साथ छोड़ दिया था। अचरज भरी निगाहों से वह स्पष्ट देख सकती थी कि रोहन उसकी बात समझ भी गया है और सुनकर गंभीर भी हो गया है।

कुछ क्षण दोनों के बीच खामोशी रही। रोहन ने गाड़ी सड़क के किनारे रोक दी और थोड़ी देर सिर झुकाए बैठा रह गया। थोड़ी देर बाद जैसे मन ही मन कुछ निर्णय लिया और काजल का हाथ अपने हाथों में लेकर बोला, ‘मैं समझता हूँ काजल, हम दोनों को हमेशा साथ देखकर मुझे भी बहुत से लोग तुम्हारे नाम से छेड़ते रहे हैं। लेकिन सच तो यही है कि मैंने तुममें हमेशा एक दोस्त ही देखा है... और फिर...’

‘और फिर क्या?’

‘सच कहूँ, तो मैंने हमेशा ही गोरी-गोरी बाँकी छोरी से शादी करने का सपना देखा है,’ हँसते हुए बोला और सारे मसले को ही हँसी में उड़ा दिया।

सुनकर काजल भी उसके साथ धीमे से हँस दी। उस हँसी के नीचे उसका दिल कहीं चिटककर बिखर चुका था। पूछ न सकी, कि क्या मैं गोरी होती तब भी तुम मुझे केवल एक दोस्त ही मानते?

पूछ न सकी, कि तुम खुद भी तो साँवले ही हो, फिर मेरा साँवला रंग तुम्हें क्यों नहीं भाता है?

कुछ भी न पूछ सकी, बस खामोशी की परतों के नीचे सारा दर्द समेटे बैठी रह गयी। वह जानती न थी कि रिजेक्शन का यह पहला दर्द था। अब तो इस दर्द की उसे आदत लगने वाली थी।

कहते हैं जैसे पहला प्यार भुलाए नहीं भूलता, वैसे ही पहला दर्द भी व्यक्ति कभी नहीं भूल पाता। काजल को तो जिस इंसान से पहला प्यार हुआ था उसी से पहला दर्द भी मिला था।

रोहन और उसके लिए अपने दिल में पनपते प्यार को कहीं कोने में दफ़न करके उसने दिन भर में खुद को सामान्य किया और रात के खाने के समय ही मम्मी-पापा के सामने शादी के लिए अपनी सहमति दे दी।

इसी के साथ शादी तय करने के सारे तामझाम शुरू हो गए। फ़ोटो खिंचवाई गयी। तीखे नाक-नक्श के कारण फ़ोटो तो लाजवाब थी ही। पहले ही परिवार में फ़ोटो देखते ही उसे पसंद कर लिया गया। और, लड़के वाले उससे मिलने उसके घर आ पहुँचे। फ़ोटो में उन्हें उसका साँवला रंग समझ में नहीं आया, लेकिन सामने से देखते ही संभावित सासू माँ के मुंह से बेझिझक ही निकल गया, ‘हमें तो लगा गोरी न सही, गेहुएं रंग की तो होगी ही, लेकिन ये तो बहुत ही साँवली...’

उस होनहार के आत्मविश्वास को रोहन पहले ही छलनी कर चुका था। रही सही कसर आज इस परिवार ने पूरी कर दी। सिर झुकाए जो अपने कमरे में बंद हुई, तो फिर सारी रात बस तकिये ही भिंगोती रह गयी। इससे पहले कभी अपनी इस कमी का अहसास उसने खुद को होने ही नहीं दिया था। उसे क्या पता था कि उसकी यही कमी उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा काँटा बन जाएगी। कोई और खूबी इस कमी की भरपाई न कर सकेगी!

‘बेटा, ये फ़ेयरनेस क्रीम मार्किट में आई है। कहते हैं, बहुत अच्छा रिज़ल्ट देती है... ट्राय करने में क्या हर्ज़ है?’ माँ ने बहुत संकोच के साथ उसे सुझाव दिया, तो उसने भी इनकार न किया।

हमारे यहाँ शादी के लिए गोरापन सबसे अनिवार्य पात्रता में से एक है। उसके मन में खीझ उठी। फ़ेयरनेस क्रीम के भरोसे अपनी चमड़ी को चमकाना कभी उसके स्वाभिमान के खिलाफ़ था, लेकिन रोहन से मिले झटके के बाद वह इस सच्चाई को स्वीकारने को तैयार हो चुकी थी। खुद पर अब उसे विश्वास न रहा था। इसलिए माँ ने फ़ेयरनेस क्रीम लगाने का सुझाव दिया, तो वह भी मान गयी।

लेकिन रिजेक्शन का सिलसिला चल पड़ा था। कभी फ़ोटो पर ही रिजेक्शन होने लगा तो कभी मिलने के बाद। पिछले सात महीनों में यह छठाँ परिवार था जो उसे आज देखने आ रहा था। फ़ोटो पर कितनों ने रिजेक्ट किया, उसका पूरा हिसाब तो मम्मी-पापा के पास ही होगा। आँखों को उदासी और निराशा ने घेर रखा था। दिल बुझा हुआ था। केवल मम्मी-पापा का दिल रखने के लिए आज भी वह लड़के वालों से मिलने को तैयार हो गयी थी। वर्ना गोरेपन से शादी करने की इस कुरूपता से वह पूरी तरह से उकता चुकी थी। भाग जाना चाहती थी इन सबसे, लेकिन बस माता-पिता के दर्द का ख़याल करके चुपचाप हर स्थिति से गुज़र रही थी।

‘मम्मी, एक बात कहूँ?’

माँ कमरे में कुछ सामान लेने आई थीं, जल्दी में थीं, फिर भी बेटी की भावनाओं का ख़याल करके उसके पास ठहर गयीं, ‘क्या बेटा, बोल न!’

‘आप लोग लड़के वालों को पहले ही क्यों नहीं बता देते कि मैं साँवली हूँ?’

सुनकर माँ का दिल रो पड़ा। उसे गले लगाकर कुछ पल शांत ही खड़ी रह गयीं। फिर धीमे से बोलीं, ‘तेरी माँ हूँ न, मुझे तो तुझमें कोई कमी दिखाई ही नहीं देती... हमेशा उम्मीद रहती है कि कोई तो तुझे तेरे रंग के परे देखेगा!’

फिर जल्दी से आँसू पोंछते हुए कमरे से बाहर निकल गयीं। अपने आँसू फिर भी सहन कर लेती, लेकिन माँ के आँसू सहन करना और भी कठिन होता था। वह खुद भी सुबक पड़ी।

लड़के वाले आ चुके थे। अब तक काजल दोबारा मुंह धोकर, फ़ेयरनेस क्रीम चुपट कर तैयार हो चुकी थी। छोटे भाई-बहन माँ के साथ मेहमानों की आवभगत में लगे थे। वह चुपचाप अपने कमरे में बैठी बुलावे का इंतज़ार कर रही थी। मन दौड़ रहा था। आज भी सन्डे लड़के वालों के चक्कर में गँवा दिया, वरना भाई-बहन के साथ किसी मॉल में घूम आती, या दोस्तों के साथ ही कोई प्रोग्राम बना लेती। सोच में डूबी थी, कि छोटी बहन बुलाने आ गयी, ‘दी, चलिए, पापा बुला रहे हैं।’ और वह अनमनी सी बहन के साथ चल दी।

‘कबीर सर, आप?’ बाहर हॉल में मम्मी पापा के साथ अपने बॉस को बैठे देख काजल चौंक पड़ी। अचरज से मम्मी पापा की ओर देखा, उनके चेहरों पर मुस्कराहट थी।

‘सॉरी काजल, मेरे ही कहने पर अंकल आंटी ने तुमसे यह बात छुपायी थी कि मेरे और तुम्हारे रिश्ते की बात चल रही है...’

कबीर सर की बातें उसके कानों पर तो पड़ीं लेकिन दिल तक नहीं उतर सकीं। दिल में तो उथल-पुथल मच गयी थी।

‘कबीर सर और मैं! वो इतने सीनियर, हैंडसम, स्मार्ट और गंभीर, क्या वो मुझसे शादी करेंगे? या फिर बस... मम्मी-पापा शादी की बात करने पहुँच गए तो ये यूं ही मेरी मज़ाक बनाने चले आये!’

काजल की आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा था। ऐसे मज़ाक के लिए दिल कहीं से भी तैयार नहीं था। ज़िन्दगी उसके साथ एक और परिहास करे, इसके लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रही थी। अभी अपनी ही उलझनों में उलझी हुई थी कि कबीर की आवाज़ फिर से कानों में पड़ी, ‘ये मेरे पेरेंट्स हैं... यदि तुम्हें मुझसे शादी करने में ऐतराज़ न हो, तो प्लीज़ एक बार बस इनके सामने अपनी स्वीकृति दे दो।’

सुनकर दोनों के माता-पिता और भाई-बहन ज़ोर से हँस पड़े। कबीर सर मज़ाकिया भी हैं, ये बात उसने अब तक कभी न जानी थी। काजल ने तेज़ी से कबीर के माता-पिता की ओर देखा। उनकी स्नेहपूर्ण मुस्कुराती नज़रों को देख उसने झट से नमस्ते करके एक बार फिर कबीर की ओर देखा। आभास ही न हुआ कि कब तक वह कबीर के मुस्कुराते चेहरे को देखती रह गयी। यह प्रेम, यह स्वीकार्यता उसने कभी रोहन की आँखों में नहीं पायी थी। बस एक स्वीकृति उसकी आँखों की चमक वापस ले आई थी।

आज उसकी आँखें और भी मनमोहक दिख रही थीं, चेहरा फिर से दमक रहा था। ये दमक किसी फ़ेयरनेस क्रीम से नहीं आयी थी। एक अस्वीकृति ने जिस दमकते चेहरे की रौनक छीन ली थी, जिन सम्मोहक आँखों में निराशा भर दी थी, जिस चहकते मन को बुझा दिया था, जिस होनहार, गुणी का सारा आत्मविश्वास छीन लिया था, उसी चेहरे पर केवल एक स्वीकृति से सारी रौनक, सारी चमक, सारी आशाएँ और सारा आत्मविश्वास वापस आ गया था।

 ***

1 thought on “फ़ेयरनेस क्रीम”

  1. बहुत सुंदर कहानी लिखी,
    या यूँ कहिये कहानी में ढला सत्य।
    कैसे लिख लेटो हैं आप ये सब.
    चरण कहाँ हैं आप के.

Comments are closed.