बदलते परिवेश

वीकेंड कहानियाँ – 02 – 16 मई, 2026

शुक्रवार की शाम। एक-दूसरे के हाथ पकड़े पाँच बच्चे तेज़ी से चले जा रहे हैं। सबकी आयु तीन-चार वर्ष। दो बच्चियाँ और तीन बच्चे। एक ही गली में रहते, एक साथ स्कूल जाते, लौटकर एक एक साथ खेलते और जो कभी देर तक खेलते रह जाएँ तो गली के किसी भी बड़े से डाँट-फटकार भी सुन लेते। खेल के बाद सबके शरीर और कपड़ों पर धूल की हल्की परत कुछ-कुछ कृष्ण सी आभा बना रही थी। चाल में उत्साह और आँखों में चमक।

जल्दी-जल्दी मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते, दौड़ते, नन्हे-नन्हे हाथों से मंदिर की ऊँची घंटियों को बजाने के लिए नीचे रखे पत्थर पर चढ़े। कुछ बजा सके, कुछ फिर भी नहीं बजा सके। पहुँच गए सीधे गर्भ-गृह में। माँ आदिशक्ति की मूरत के आगे हाथ जोड़े और लगभग तुरंत ही पंडित जी के सामने वो हाथ पसार दिए।

पंडित जी मुस्कराए। ‘हो गई खेल-कूद?’ बच्चों ने तेज़ी से सिर हिलाए। जब तक पंडित जी ने उन पर जल छिड़का, सबके माथे पर छोटे-छोटे तिलक लगाए, वो नन्हीं हथेलियाँ उनके सामने ही पसरी रहीं। मानो पंडित जी भी नन्हे बालकों के प्रसाद की लालसा का आनंद ले रहे थे, और जानबूझ कर प्रसाद देने में देरी कर रहे थे? या फिर इसी बहाने संस्कारों की छोटी-छोटी आदतें सिखा रहे थे? कौन जाने?

प्रसाद मिलते ही उतनी ही तेज़ी से मंदिर की सीढ़ियाँ उतरते पहुँच गए फुटपाथ पर लगी, बिजली की रोशनी में दमकती चमकदार दुकानों पर। रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, छोटे-छोटे लकड़ी के खिलौने, गुड्डे-गुड़िया और सिर हिलाते बुड्ढे-बुढ़िया, चाय का सेट, बैंड-बाजे वाले, लकड़ी के बाल-गोपाल, सीता-राम, और राधा-कृष्ण।

ख़रीदने को आतुर बच्चों ने दाम पूछे और अपनी जेबें टटोलीं। किसी के हाथ में दस पैसे, किसी के पास बीस पैसे या चार आना। उतने पैसों में एक-एक खिलौने तो आ ही जाते, या फिर चार-छह जोड़ी चूड़ियाँ। लेकिन बिना पूछे खिलौने लेकर घर पहुँचे तो? डाँट के डर ने रोका। पैसे तो झूला झूलने के लिए मिले थे। इसके अलावा उन पैसों से अधिक से अधिक समोसा या सेंव खाया जा सकता था।

भारी मन से उन दमकती दुकानों को पीछे छोड़ा, और झूले झूलकर, एक-एक दोना सेंव लेकर, छोटे-छोटे पग भरते लौट चले घर की ओर।

तेज़ हॉर्न से तंद्रा टूटी।

आज भी तो है, शुक्रवार की शाम।

चारों ओर गति पकड़ने को आतुर, लेकिन भारी ट्रैफ़िक में फँसी सैकड़ों गाड़ियों का समंदर। आठ-दस लेन की चौड़ी सड़क पर चारों ओर पसरी केवल गाड़ियाँ ही गाड़ियाँ।

वहीं एक सिरे पर रोशनी में दमकता एक बड़ा सा शोरूम। शेल्फ़ पर सलीक़े से सजी हुई, रोशनी में दमकती ढेर सारी, रंग-बिरंगी बोतलें। काँच के काउंटर के अंदर कुछ रंग-बिरंगे पैकेट। काँच से प्रतिबंबित होता प्रकाश सड़क के दूसरे सिरे तक पहुँच रहा था।

दमकते परिधानों में सजे-सँवरे युवक-युवतियाँ। कार्ड स्वाइप करते, सैकड़ों - हज़ारों के भुगतान बेहिचक करते।

धूल का नामोनिशान नहीं। अगर था, तो बस चारों ओर धुआँ ही धुआँ... कुछ सड़क पर, कुछ चेहरों के आसपास और कुछ मनोमस्तिष्क पर।

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