साप्ताहिक कहानी – 23
“माधव! जल्दी चलो, चित्रहार शुरू होने वाला है।”
कुसुम दीदी की आवाज़ सुनते ही माधव और उसके साथियों ने फटाफट अपने कंचे समेटे, निक्कर की पॉकेट में भरे और झटपट उनके घर की ओर भागे।
पूरी कॉलोनी में कुल तीन घरों में ही टीवी थी। लेकिन सबके घर के दरवाज़े कहाँ हर बच्चे के लिए खुलते थे? लेकिन माधव के घर के दरवाज़े उसके सारे दोस्तों के लिए खुले रहते थे। माँ नहीं तो भाभी, भाभी व्यस्त तो कुसुम दीदी, कोई न कोई बच्चों को बुला लेता और सब बैठकर चित्रहार का आनंद लेते।
देखते ही देखते कॉलोनी के अधिकतर बच्चे माधव के घर में थे।
टीवी के ठीक सामने ज़मीन पर चटाई बिछा कर सभी बच्चे अपनी-अपनी जगह लेकर बैठ गए। पीछे कुछ कुर्सियों, सोफ़े और दीवान पर दादाजी, दादी, अंकल, आंटी, दीदी, भैया और भाभी।
दीदी ने उस ब्लैक एंड वाइट टीवी पर पड़ा कवर हटाया, शटर खोला और टीवी ऑन की। सारे दर्शक बेसब्री से प्रतीक्षा करते रहे।
फ़िल्मी गीतों के इस आधे घंटे के कार्यक्रम को देखने के लिए कितने मन इंतज़ार करते रहते थे।
चित्रहार के समय तक सब अपने-अपने काम पूरे कर लेते। क्यों नहीं? चित्रहार के छूटे, ये किसे पसंद आता?
ये अस्सी के दशक के दिन थे। टीवी पहली बार घर-घर तक पहुँचा था। अब तक सिनेमा केवल थिएटर तक उपलब्ध था। रेडियो पर गाने सुनने का चलन था। लेकिन गाने देखने को मिलें, ऐसा तो कभी जाना ही न था।
अब वो माध्यम मिल गया था। टीवी पर गाने देखना एक अलग ही प्रकार की ऊर्जा लेकर आता था। बच्चे, बड़े या बूढ़े, हर उम्र के लोगों को बेसब्री से प्रतीक्षा रहती थी गानों के इस कार्यक्रम की। बुधवार और शुक्रवार शाम आठ बजे गीतों-भरा कार्यक्रम चित्रहार, और फिर रविवार की सुबह रंगोली।
गानों का संग्रह ऐसा कि अक्सर वही गाने दो-चार सप्ताह में फिर-फिर देखने को मिलते। फिर भी उनका चाव था।
कमी थी, तो प्रतीक्षा थी।
कमी थी, तो महत्त्व था।
कमी थी, तो जो मिल जाता था, वही अच्छा लगता था। बारबार दोहराए जाने वाले गीत भी पूरे चाव से पूरी कॉलोनी एक साथ बैठकर देखती।

मोबाइल पर गीतों की ऐप पर स्क्रोल करते माधव की उँगलियाँ सहसा ठहर गईं।
ज़िंदगी कितनी बदल गई! वह हैरान था।
जो चीज़ पहले पूरे मोहल्ले में एक हुआ करती थी, जिसमें ख़ुद चुनाव का कोई मौक़ा नहीं मिलता था, वो आज हर हाथ में है।
वो कमी थी, जो पूरे मोहल्ले को जोड़ती थी।
यह सुविधा, जिसके साथ हर मन अकेले जुड़ा है।
- गरिमा
