मेरा भारत
ओढ़कर धानी चुनरिया
दिशाएँ हरियाली कर दें
कि धरा को हरित संपदा से सुसज्जित कर दें।
धारण कर श्वेत-अंबर
बिखरा दें शांति चहुँ ओर
कि इस विश्व-कुटुंब में प्रेम-सौहार्द्र बढ़ा दें।
लहराकर केसरिया,
ओज से भर दें दसों दिशाएँ
कि अतुल्य भारत शक्ति का शंखनाद कर दें।
नील चक्र सम निरंतर गतिशील,
प्रगति-पथ पर अग्रसर रहें,
भारत की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण, अटल बना दें।
।।वंदे मातरम्।।

कोमल पौध से वृद्ध वृक्ष तक
कभी किसी नवांकुर, नव-पौध के नव-कोपलों को
स्नेह के कोमल हाथों से स्पर्श किया है?
जीवन रक्षण के प्रति सशंक,
उसके भय को महसूस किया है?
कीटों से ख़ुद को बचाते
उस किसलय की पीड़ा को समझा है?
जो हर पदचाप से आक्रांत हो जाता है,
अपने अस्तित्त्व के प्रति आकुल,
अपने भविष्य के प्रति सशंकित हो जाता है?
अनगिनत अनकहे, अव्यक्त भय मिलेंगे वहाँ
जहाँ नवपल्लवित पौध ख़ुद को तैयार कर रही है
भविष्य के पथिकों को बिना शर्त आश्रय देने के लिए।
कभी किसी छायादार वृद्ध वृक्ष को बाँहों में भरकर देखा है?
उसकी थमी-थमी सी धड़कनों को महसूस करके देखा है?
झरती पत्तियों से, सूखती डालियों से
कुछ बातें करके देखा है?
बूढ़े हो रहे उसके तनों की सिलवटों से कुछ संवाद करके देखा है?
अनगिनत कहानियों और अनुभवों के भंडार के साथ,
बहुत सी अनकही पीड़ा सुनाई देगी वहाँ
कुछ सिसकियों की गूँज सुनाई देगी वहाँ
जहाँ न जाने कितने पथिकों को बिना शर्त आश्रय मिला है सदा।
(22 अगस्त, 2026)


दुनिया
आँखें मूँद लो तो सारा जहाँ हमारा
जो आँखें खोल दीं, तो ख़ुद अपना साया भी नहीं हमारा!
(1 अगस्त, 2026)

क्या सचमुच आया सावन झूम के?
किसी के लिए आया सावन झूम के
तो कहीं गाता मेघ मल्हार है, सावन
किसी के लिए मद्धम बारिश की सोंधी फुहार है
तो कहीं प्रतीक्षित संदेश के मेघदूत हैं सावन
कोई दर्द और पीड़ा को इसमें बहते देखता है
तो कोई ख़ुशियों के बादलों को बरसते देखता है.
किसी के लिए टपकती छप्परों से बहती जलधार है
और किसी के लिए मानसून सत्र की सियासत है सावन
कहीं चाय, पकौड़े और समोसे की गर्माहट है सावन
तो किसी के लिए सुकून का मीठा एकांत है सावन...
कहीं, किसी कोने में प्रकृति की रिमझिम छाँव में बैठकर
किसी के लिए शिव से साक्षात्कार है सावन।
(31 जुलाई, 2026)

जीवन अमलतास कर लें
वो कहते हैं, नदियों को साफ़ मत करिए,
बस उन्हें गंदा मत कीजिए,
साफ़ तो वो ख़ुद ही ख़ुद को कर लेंगी.
पर्वतों की संपदा बचाने को नए पर्वत नहीं बनाने हमको.
बस उन्हें खोदना बंद कीजिए,
अपनी अनमोल संपदा का ख़याल वो ख़ुद ही कर लेंगे.
आकाश के विस्तृत पटल पर कोई रंग भरने नहीं हमको
वो हम कर भी नहीं सकते!
आकाश के विस्तृत पटल पर कोई रंग भरने नहीं हमको
बस, हवा प्रदूषित न करें,
वो ख़ुद ही ख़ुद को रंग लेगा!
धरती से जल पाने को नए कुएँ नहीं खोदने हमको
बस मिट्टी को मिट्टी रहने दें
उन पर सीमेंट नहीं पोतें
उन पर प्लास्टिक न चढ़ाएँ
भूजल खुद ही बढ़ जाएगा...
गाय-बकरी, कुत्ते बिल्लियों के मुद्दे उठाकर
अमानुष यूँ भी मत बनिए,
उनकी अहमियत स्वीकारें, अपनी जान बचा लें
वो अपना ख़याल ख़ुद ही रख लेंगे!
उनकी जान छोड़िए, वो अपनी जान ख़ुद बचा लेंगे.
धरा पर वर्षा लाने को नए मेघ नहीं रचने हमको
वनीय संपदा सँभालें, थोड़े जंगलों को बचा लें,
धरती का संतुलन बना रहा
तो ये मेघ ख़ुद ही झूम-झूम बरसेंगे
धरती का संतुलन बचा लें
ये मेघ ख़ुद ही बरसेंगे
धरा पर वर्षा लाने को नए मेघ नहीं रचने हमको!
धरती पर रंग भरने को नए वनस्पति नहीं रचने हमको
कोई पुष्प, कोई पाती, कोई नए पौधे हमें नहीं बनाने!
धरती पर रंग भरने को नए वनस्पति नहीं रचने हमको
बस माटी प्रदूषित न करें,
वो ख़ुद ही ख़ुद को पल्लवित कर लेगी!
माटी को प्रदूषित न करें,
धरती ख़ुद ही ख़ुद को पल्लवित कर लेगी!
अपना जीवन बचाने को
भविष्य छोड़िये, वर्तमान बचाने को
धरती, आकाश, वायु और जल को संभालें
यह अग्नि सँभालें
जीवन अमलतास कर लें!
अपने जीवन को ख़ुद ही यह उपहार दे दें,
जीवन पुष्पित पल्लवित कर लें!
जीवन अमलतास कर लें!
(5 जून, 2026)

कुछ राक्षस वद्ध कर आएँ
जब जब जीवन वनवास दे
दुष्कर, पथरीली राहें अप्रत्याशित घाव दें।
अनगिनत चुनौतियाँ जब तीर सी प्रहार दें।
परिस्थितियों को तब क्यों कर कोसना?
भाग्य-दुर्भाग्य-सौभाग्य को क्या तोलना?
क्यों किसी कैकेयी या मंथरा से कुपित होना?
क्यों न सीता-राम के चरित्र-दर्शन समझना?
हाँ, दैवीय थे, किंतु लीला तो मानव की रची थी
रहे होंगे भूमिका में, फिर भी देह तो मानव की थी।
मानव-जनित भावनाओं ने कुछ तो उन्हें भी तड़पाया होगा।
दुरूह भयावह वनों के कष्टों ने उनको भी तो झुलसाया होगा।
हर पीड़ा को गले लगाकर फिर भी सदियों की सीख दे गए –
“वनागमन हुआ ही है, तो चलो, कुछ राक्षसों के वध कर लें।”
(दिसंबर, 2025)

शब्द संसार
शिव के डमरू के नाद से निकले सुर
और उस सुर से बने शब्द...
और बना, शब्दों का ये संसार
शब्द अहसास हैं, अभिव्यक्ति हैं
वही चेतना हैं, और चेतना का संचार भी
शब्द विचार हैं...
जो लेखनी में रच बस, पन्नों पर उतर जाते हैं
और, कभी सुरों में घुल संगीत बन जाते हैं..
कभी ढोल की थाप पर खनकते,
तो कभी घुंघरुओं की रुनझुन में थिरकते सुनाई देते हैं।
शब्द प्रेम हैं, शब्द ही स्नेह, करुणा और स्पंदन हैं
लेकिन...
शब्द ही नफ़रत में जल, क्रंदन बन जाते हैं।
शब्द ही अक्सर दिलों को छलनी भी कर जाते हैं
कभी अहंकार के वार से, तो कभी ईर्ष्या के प्रहार से
अंतस को घायल कर जाते हैं...
और तो और, कभी ख़ुद अपने ही शब्दों से हम आहत हुए जाते हैं।
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शब्दों सा कभी सरल, कभी क्लिष्ट जीवन
शब्दों सा कभी सरल, तो अक्सर क्लिष्ट ये जीवन
कभी व्यक्त, अक्सर अव्यक्त,
कभी गम्य, सुगम्य, अक्सर दुष्कर,
कभी सुलझा, अक्सर उलझता हुआ
बनते, दरकते, बिगड़ते भरोसों के बीच,
समस्याओं, समाधान के क्रम में उलझाता,
सपनीले, पथरीले, कँटीले पथों पर घुमाता,
असंख्य अनुभव, नित-नई सीख दे जाता है।
यूँ-ही पल-प्रतिपल, दिन-प्रतिदिन,
माह-प्रति-माह के हिसाब करते,
साल-दर-साल बीतते जाते हैं,
और जीवन की हरेक परत हम जीते जाते हैं।
(15 जनवरी, 2026)

माँ
आज नीले आकाश में टिमटिमाता
एक छोटा-सा सितारा देखा!
क्या सचमुच दिल्ली की हवा
स्वच्छ हो गई है?
या सचमुच माँ उस लोक से
झाँकती, निहारती हैं हमें?

शब्दों का संसार
मोतियों से सजते शब्द,
कभी बनते विकट जाल
सुषुप्त ज्वालामुखी से,
कभी लाते असह्य भूचाल
खिलखिलाहट में खोते
कभी आँखों से छलक पड़ते
ख़ामोश परतों में दबे-दबे,
कभी दावानल से दहकते
कभी यादों में महकते,
अन्तःकरण गुंजित करते
कभी चिंगारी बन सुलगते,
शूल बन चुभते रहते
कहीं सूक्ष्म अनुभूतियां बन रिसते,
छलक जाते,
कभी मौन में सिमटते,
अनंत शून्य में ठहर जाते।

कलाकार कभी अकेला नहीं होता
कलाकार कभी अकेला नहीं होता
कभी श्वेत-श्याम तस्वीरें उकेरता...
तो कभी तूलिकाओं के रंग बिखेरता
कहीं सुरों को साज़ में ढालता...
कभी घुंघरुओं की रुनझुन में ख़ुद खो जाता
शब्दों से बनाए अपने कल्पना लोक में
अपने स्वप्निल किरदारों के साथ जीता है
पर वह कभी अकेला नहीं होता है।
कभी मुस्काता, कभी विचारों में डूब जाता
कभी हँस देता, तो कभी बिलख भी पड़ता है
कुछ भी करता, लेकिन कभी अकेला नहीं होता...
वैसे ही जैसे, कलाकार कभी मरता भी नहीं है!
उन उकेरी तस्वीरों में, उभरी-गहरी नक्काशियों में
कहीं न कहीं साँसें लेता रहता है।
संगीत में पिरोये अपने हर सुर, हर ताल में
गीतों में ढली उन मधुरिम तान में,
अपने रचे एक-एक किरदार में,
कल्पना से सजाए अपने मनभावन संसार में
कभी हंसता, तो कभी सिसकता रहता है
कभी रोता, कभी खिलखिलाता रहता है
कहीं, किसी कोने में हर पल हौले-हौले मुस्काता रहता है...
कलाकार हमेशा जीता रहता है...

प्रेमगीत या राष्ट्रगीत
प्रेम की पाती लिखने वालों
प्रेमगीत ही गाने वालों,
कुछ याद तुम्हें, यह वही दिन है,
जब चालीस भाई शहीद हुए थे?
जब राष्ट्र के चालीस रक्षक एक ही दिन मर-मिटे थे।
जब अस्सी कलाइयाँ सूनी हो गईं,
और चालीस जीवन बेरंग हुए थे।
जब चालीस घर इक-साथ उजड़े,
और बच्चे सहसा अनाथ हुए थे।
कितने ही माता-पिता की आँखों में
जब सूनापन उतर गया था।
अनगिनत संगी-साथी जब असह्य पीड़ा से बिलख पड़े थे।
नि:शब्द रह गया था भारत, कतरा-कतरा सिहर उठा था।
राष्ट्र पे न्योछावर होने वालों के आगे,
ये प्रेम के गीत, ये प्रेम-प्रसंग सब, तनिक भी नहीं भाते हैं।
कुछ पुष्प चढ़ा दो, उस पथ पर
जहाँ से निकले शहीदों के रस्ते
उनकी शौर्यगाथा को समर्पित,
कोई तो एक गीत सुना दो।
गुलाबी दिलों की क्या कहूँ अब
हर दिल में बस तिरंगा लहरा दो।
हर दिल में बस तिरंगा लहरा दो।
(14 फ़रवरी, 2026)

माँ
ज़िक्र जब चलता है माँ के प्यार का
यादों का एक बड़ा-सा पिटारा खुलकर बिखर जाता है।
वो जिसमें लाद-प्यार और दुलार की भरमार है।
तो अनुशासन और कड़क सीख भी बेशुमार है।
क्या हुआ जो आज नहीं साथ है,
दिल कहता वो सब कुछ कर लो
जो कहे वो आज भी यहीं, आसपास हैं!
बचपन की गलियों में चलो, लुका-छिपी खेल आएँ
गुड़िया-गुड्डे के ब्याह की धूम मचा आएँ।
गीतों की मधुर तान पर थिरक लें जी-भरकर के
रंगों की तूलिकाओं से तस्वीरों में जीवन भर दें।
समय के चक्र में बदले जीवन के साथ,
यह सब चाहें भी तो करें कैसे साकार?
लुका-छिपी खेलने वाले साथी कहाँ से लाएँ अब?
गुड़िया का ब्याह रचाने वाला बचपन खो आए हम!
गीत जो रूठे, पाँव की थिरकन कहीं गुम हो गई।
दुनिया की रंगत कुछ धूमिल, कुछ बेरंग हो गई...
(मई, 2024)

यादें
पुराने काग़ज़ातों के बीच
किसी पुरानी किताब के अंदर
हमेशा भूले-बिसरे नोट नहीं मिलते
हर बार सूखे फूल नहीं मिलते।
कभी-कभी कुछ काँटे भी मिल जाते हैं।
कुछ बेबस, हताश-सी आशाएँ भी मिल जाती हैं।
कुछ बिखरे, टूटे हुए सपने भी मिल जाते हैं।
जिनमें कुछ तीखी-कड़वी यादें भी मिल जाती हैं।
(2015)

बाँट दो ज़िन्दगी...
बाँट दो चंद हिस्सों में ज़िंदगी, ऐसे कि निबाह कर लूँ।
हर हिस्से में ज़िंदगी की एक राह का हिसाब कर लूँ।
एक हिस्से में दुनियादारी के कसैले स्वाद चख लूँ।
एक में कुछ भारी, कुछ सहज सी साँसें भी गिन लूँ।
एक हिस्से में दायित्त्वों के बोझ निभा लूँ, मुस्कराती
एक में कुछ अधिकारों पर हक़ जमा लूँ, खिलखिलाती।
कुछ पीड़ा, कुछ आँसुओं के हिसाब कर लूँ, सहजता से
तनाव में उलझे दिलों को कुछ हँसी, कुछ मुस्कान दे दूँ।
दुनियादारी के जाल से निकल फिर,
एक हिस्सा अपने नाम कर लूँ...
चंद टुकड़े ज़िंदगी के, चंद रंगत इस प्रकृति से,
बँटोरकर दामन में भर लूँ।
पंख लगाकर फिर उड़ जाऊँ,
आसमान में उस अनदेखे के संग में...
(2021)

कौन दिशा से आए पंछी
कौन दिशा से आए पंछी,
कौन दिशा में जाओगे?
पौष, माघ, फाल्गुन गाने क्या
संगम तीरे आए हो?
कौन नियम से ख़ुद को बाँधा,
कौन सी लिख रहे हो गाथा?
गंगा जमुना सरस्वती पर
हर साल जो डेरा डाले हो?
पौष, माघ, फाल्गुन गाने क्या
संगम तीरे आए हो?
(जनवरी, 2023)

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मुखौटे
निकल पड़ती हूँ रोज़ मुखौटों के जंगल में
सच की नीरवता पर ख़ुद भी एक मुखौटा चढ़ाकर
ताप से पिघलते कभी जल-धार से विगलित होते
एकाकी साँझ ढले रख देती बेपरवाह ताक पर।

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ज़िंदगी की बेदर्दी
ज़िंदगी की बेदर्दी से जब कभी
मन घबराए,
बेबसी चुपके से जब हौं
सलों पर हावी हो जाये,
कुछ न करो, कुछ न कहो,
हौले से बस मुस्करा दो.
यक़ीन मानो, उस मुस्कान में दर्द
धीरे से पिघल जाएगा।
निराशाओं के अँधियारे में
आशा की लौ टिमटिमाएगी,
ज़िंदगी का हौसला फिर से
वापस आ जाएगा।
दर्द जब टीस बन दिल को
छलनी कर जाये,
ज़िंदगी की बिरंगी जब
आँखों में उतर आए,
एक बार, कोशिश करके,
जी-भरकर खिलखिला दो।
दर्द भी हैरान हो,
कसमसा-कर रह जाएगा।
निराशाओं में आशा के डीप
जगमगाएँगे।
ज़िंदगी का हौसला फिर
बुलंद हो जाएगा।



© गरिमा

