साप्ताहिक कहानी – 14 – 9 अगस्त, 2026
सामने झमाझम बरसता पानी, गली की साफ़ सड़क पर ऐसे लय-ताल-बद्ध होकर गिरता जैसे हज़ारों नृत्यांगनाओं के घुँघरू झनक रहे हों। धरती पर गिरती वर्षा की बड़ी-बड़ी बूँदें ऐसी दिखती मानो धरती की कड़ाही में आसमान पकौड़ियाँ तल रहा हो! मंत्रमुग्ध सा निहारता बचपन, और उस बचपन की कल्पनाएँ, उसकी उपमाएँ। और बालमन में उमड़ता बालकाव्य का रस। सारे बच्चे एक सुर में मचल उठते –
पानी बरसा झमाझम, छाता लेकर निकले हम।
पाँव फिसल गया गिर गए हम।
ऊपर छाता, नीचे हम।
बचपन की कविता को साभिनय निभाते, कोई सचमुच गिर गया, तो कोई उसके ऊपर भड़ाम हो गया और निश्छल हँसी से मानो पूरा घर चहक उठा। घर की हर दीवार, छत और किवाड़ तक में मानो मासूम खिलखिलाहट के घुँघरू झनक उठे।
काग़ज़ की नाव बनाने की होड़। सबसे बड़ी नाव बनाने की होड़। गली में भरे पानी में उस नाव को दूर तक तैराने की होड़। उस होड़ में सभी बड़ी दीदियों और भैयाओं को भी अपने खेल में शामिल करना।
रेनी डे के कारण हुई छुट्टी का परम-आनंद! उस आनंद में कई गुणा रस घोलती आलू और प्याज़ की पकौड़ियों की सुगंध! कभी दौड़कर मुट्ठियों में पकौड़ियाँ भरता बचपन, तो कभी बारिश के पानी में नाव तैराने का आनंद लेता बचपन।
और, आज रपट जाएँ की धुन में हँसता, खिलखिलाता, रपटता, अतीत।

सारा अतीत लौटकर चलचित्र की तरह सामने आ जाता है। जब ऑफ़िस की काँच की खिड़की से बाहर झमाझम होती बारिश को तकता है। “अब घर कैसे जाएँगे?” का सवाल हर मन में कौंधता है – क्योंकि गुड़गाँव जैसी बहुत सी जगहों में बारिश में काग़ज़ की छोटी-छोटी नावें नहीं तैरतीं। खिड़की के उस पार तैरती हैं, कारें, स्कूटर्स, बाइक्स, ऑटो-रिक्शा। और खिड़की के भीतर से तकती हैं कई जोड़ी शांत निगाहें। बारिश की झमाझम में मन उत्साह से अधिक चिंता से भरा है। पकौड़ियों की चाहत पर फ़िटनेस की चिंता भारी पड़ने लगी है। और मासूम खिलखिलाहट के घुँघरुओं की जगह ले ली है कीबोर्ड पर टप-टप बजती उँगलियों की थाप ने... ताल-बद्ध नहीं, लेकिन फिर भी, लगातार, अनवरत।
- गरिमा संजय
तस्वीर क्रेडिट – AI: मैंने AI से ऐसी गली बनाने के prompt दिए जिसमें मेरे बचपन के घर की गली नज़र आती। लेकिन इसने जो बनाया वो सामने है – ऐसा लगता है जैसे चौक-लोकनाथ की गली का चित्रण कर दिया हो। यह भी अच्छी लग रही है, सो इसे ही साझा कर रही।
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