साप्ताहिक कहानियाँ – 13 – 1 अगस्त, 2026
रविवार की सुबह थी। दो जोड़ी नन्हे-नन्हे क़दम तेज़ी से घर की गली को पार करके, एक और गली को पार करके बड़ी सड़क पर पहुँच गए थे। दोनों बच्चों की चाल में अजब सा उत्साह था। एक-दूसरे का हाथ पकड़कर सड़क पार की। सड़क के दूसरे छोर पर, चौरस्ते के पार सेठी जी की दुकान थी, जहाँ ब्रेड-मक्खन जैसे सामान मिलते थे।
पूरी दुकान रंग-बिरंगे पैकेट्स से सजी होती थी। एक ओर तरह-तरह के बिस्कुट, दूसरी ओर विभिन्न प्रकार की दालमोठ और जाने क्या क्या! पाँच-छह बरस के उन बच्चों को हर सामान की जानकारी न थी। क्योंकि उनका सारा ध्यान ब्रेड और मक्खन पर ही रहता था। वो समय था, सीमित आय, सीमित आवश्यकताओं और सीमित खर्चों का।
बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था, क्योंकि आज नाश्ते में ब्रेड मक्खन मिलेगा। वो बात अलग है कि साथ में दूध और दलिया भी खानी पड़ेगी। लेकिन साथ ही अनिल गुरु के यहाँ की गर्मागरम जलेबी भी तो मिलेगी! जिसकी चाशनी बेस्वाद दलिया की कमियों की भरपाई करने का काम करती। ब्रेड-मक्खन जितना पसंद, दलिया उतनी ही नापसंद थी, फिर भी सारे भाई-बहन ख़ुश थे। क्योंकि दलिया जल्दी से ख़त्म करके ब्रेड-मक्खन और जलेबी का आनंद आराम से लिया जा सकता था। तो सेठी जी के यहाँ से अमूल मक्खन और अमृत की ब्रेड लेकर लंबे-लंबे पग भरते चले वापस उसी रास्ते, जिधर से आए थे।
बरसों नहीं दशकों बीत गए। दलिया का स्वाद बेहतर लगने लगा। शहर बदला तो अमृत की स्थानीय ब्रेड छूटी। किन्हीं कारणों से जलेबी से भी नाता छूटा।
कुछ ऐसा है, जो नहीं छूटा, नहीं बदला।
अमूल मक्खन। उसका वो पैकेट, जिस पर पोल्का डॉट वाली ड्रेस पहने, नीले बालों वाली नटखट सी बच्ची की मनभावन तस्वीर हर बच्चे को अपनी सी लगती थी! उसका आकर्षण आज पचास साल बाद भी बना हुआ है। जिस अमूल मक्खन को ख़रीदने के लिए दो नन्हे-नन्हे बच्चे दो गलियों और एक सड़क को पार करके जाते थे, आज वह एक ऐप पर क्लिक करके घर बैठे मिल जाता है।
यही अमूल मक्खन कई बार मिल जाता है, ट्रेन और एयरोप्लेन की यात्रा में जलपान के साथ... और अनायास एहसास दिला जाता है, जीवन की लंबी यात्रा के एक मौन साथी का।


बहुत ही सुन्दर , सबके साथ ,सब के अहसासों से जुड़ी
हृदय से आभार, प्रिय सुषमा जी।