बिजली गुल

साप्ताहिक कहानियाँ – 12 – 26 जुलाई, 2026

परीक्षाएँ सिर पर थीं। शाम के समय हम भाई-बहन पढ़ने बैठे ही थे कि बिजली गुल।

बड़ी दीदी का ग्रेजुएशन, भैया की ग्यारहवीं तो मेरी आठवीं कक्षा की पढ़ाई। बड़ी दीदी ने लालटेन जलाया और कमरे के बीचों-बीच लटका दिया। तीनों भाई-बहनों की हालत पसीने से बेहाल थी। लेकिन किसी की क्या हिम्मत कि चूँ भी करे!

बिजली कब तक आएगी ऐसा कोई सवाल करना नहीं था। क्योंकि उस सवाल का जवाब तो ख़ुद बिजलीघर वालों के पास भी नहीं होता था।

बिजली मन की मालकिन होती थी। बहुत कमी के बीच से आती थी। पूरे देश में तो आती भी नहीं थी।

बात उन दिनों की है जब बिजली न आना आम बात हुआ करती थी, बल्कि ख़ुशी का अवसर तो तब होता था जब बिजली आ जाती थी।

शुरू में इन्वर्टर थे नहीं और शोर-धुआँ करने वाले महँगे जेनरेटर केवल दुकानों, ऑफ़िस आदि तक ही सीमित हुआ करते थे। धीरे-धीरे इन्वर्टर आए, और बिना आवाज़, बिना धुआँ, बिना गर्मी बिजली देने वाला यह संसाधन तेज़ी से लोकप्रिय हो गया। महँगा था, लेकिन आवश्यकता बनता गया।

जैसे-जैसे इन्वर्टर की लोकप्रियता बढ़ती गई, वैसे-वैसे बिजली और अधिक गुल होने लगी। धीरे-धीरे स्थिति यह हो चुकी थी कि चौबीस घंटों में आठ-दस घंटे बिजली गुल रहती। गर्मियों के दिनों में ऐसा विशेष रूप से होता। इतनी देर-देर तक बिजली गुल रहती कि इन्वर्टर की बैटरी बैठ जाती और हम फिर से लालटेन के युग में पहुँच जाते।

बिजली आने का निश्चित समय और जाने का भी निश्चित समय। कभी-कभी उस निश्चित अवधि के बाद भी, अचानक गुल हो जाती!

सभी असहाय थे! समस्या का समाधान नहीं, क्योंकि बात पहुँचा सकें, ऐसा कोई माध्यम उपलब्ध न था। इंटरनेट आ चुका था, लेकिन आज जैसा नहीं – महँगा और सीमित! सोशल मीडिया – भविष्य की बात थी!

ऐसे में कभी लालटेन तो कभी एक बल्ब की मध्यम रोशनी में पूरा परिवार साथ बैठता, और शुरू हो जातीं ढेर सारी बातें। माँ के किस्सों, दादी-नानी की कहानियों और पिताजी के ढेर सारे अनुभवों के बीच जीवन से जुड़ी अनगिनत छोटी-बड़ी सीखें। और परिवार का साथ।

यादें उन दिनों की जब बिजली जाना आम बात होती थी। फ़ोटो क्रेडिट - एआई

आज समय बदल चुका है। आज बिजली है।

आज बिजली जाती तो है, पर नियमित रूप से नहीं, कभी-कभी। अधिकतर किसी फ़ॉल्ट के कारण।

आमतौर पर इतनी देर के लिए नहीं कि गुज़ारा उस तरह से कठिन हो जाये।

लालटेन तो आज एंटीक चीज़ बन चुकी है।

आज हमारे पास इंटरनेट है – सस्ता और टिकाऊ।

आवाज़ के उठाने के लिए सोशल मीडिया सदा उपलब्ध हैं। बात करने के लिए ऑनलाइन लोग हैं। मनोरंजन के लिए ही नहीं, सीख के लिए भी रील हैं।

लेकिन वो सीखें नहीं जो परिवार के बड़े सदस्य बातों-बातों में बच्चों को दे दिया करते थे।

  • गरिमा संजय

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