गालियों की दुनिया

साप्ताहिक कहानी – 16 – 22 अगस्त, 2026

“अबे, मेरे कंचे मुझे वापस दे।”

पाँच वर्ष के बंटी की भाषा पर पिताजी गरजे – ‘इत्ती सी उम्र में गालियाँ देता है?

आसपास के सभी बच्चे सहम गए। ढाई-तीन साल की मोनी पर शायद सबसे गहरा असर पड़ा।

माँ के पास पहुँची – “गालियाँ क्या होती हैं?”

“गंदी भाषा, बेटा। सभ्य परिवार के बच्चे गालियाँ नहीं देते।”

माँ की बात हृदय पर छप गई। इसी के साथ शुरू हुई भाषा के आधार पर पारिवारिक पृष्ठभूमि को आँकने की यात्रा। सुसंस्कृत भाषा अर्थात् सुसंस्कृत पृष्ठभूमि।

बचपन की गलियाँ – जहाँ शिक्षा का बीजारोपण हुआ – AI द्वारा निर्मित काल्पनिक चित्र

जीवन बाल्यकाल सा नहीं होता। यात्रा लंबी, जिसके हर पड़ाव पर होता है विविध प्रकार के जीवों से साक्षात्कार!

समय बीता। दशक बीते। शहर बदला और बदला परिवेश।

मन पर पड़ी छाप न बदली, लेकिन बदली दुनिया।

सामना हुआ नई संस्कृति से।

यहाँ तो पुरुष-महिलाएँ सभी गालियाँ देते हैं! सभी की सामान्य बोलचाल की भाषा में गालियों की भरमार है!   

केवल अबे-तबे नहीं! बहुत कुछ। जिनका अर्थ भी शायद बिना समझे। या शायद समझते बूझते? मन सवालों में उलझ गया।

हैं तो सभी पढ़े-लिखे। आख़िर अच्छी कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं। फिर ऐसी भाषा? क्रोध में नहीं, सामान्य बातचीत में! कैसे? शायद किसी होड़ में?

बचपन की दृढ़ छाप धीरे-धीरे दरकने, चटकने लगी।

संस्कृति स्वीकार करना कठिन था, किंतु नज़रअंदाज़ करना कठिन नहीं। यह कान बंद और आँखें मूँदे रखने की वयस्कता थी।

आधुनिक जीवन की सामान्य झलक – AI द्वारा निर्मित काल्पनिक चित्र

फिर जंतर-मंतर हुआ। यहाँ क्रोध में जो उगला गया वह जेन-ज़ी से नहीं आया था। यह पिछले अनेक वर्षों में विकसित हुई पृष्ठभूमि का परिणाम था।

जंतर मंतर आंदोलन की AI द्वारा निर्मित काल्पनिक तस्वीर

मूल्यांकन शुरू हुआ… किसी ने कहा सबसे अधिक गालियाँ पुलिस वाले देते हैं। उनसे भी अधिक गालियाँ रेड-लाइट की स्त्रियाँ देती हैं। (संदर्भ – एक सेवा-निवृत्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पॉडकास्ट पर आधारित)।

हालाँकि समझना कठिन था क्योंकि निकट से किसी पुलिस वाले को जाना नहीं। लेकिन तर्क ने स्वीकृति दी – दिन रात, लगातार अपराधियों से निपटने का प्रभाव होगा।

रेड-लाइट की स्त्रियों की भाषा को भी तर्क ने सही ठहराया… वे भी तो दिन-रात अपराधी मानसिकता से निपटती हैं। सुसंस्कृत भाषा से जीवन कैसे संभव होगा?

लेकिन जंतर-मंतर कहाँ से आया होगा? कहा गया कि इस आंदोलन में आए लोगों की भाषा पुलिस वालों और रेड लाइट क्षेत्र की स्त्रियों से भी अधिक बुरी थी।

शायद सच यही कि बिना सोचे, बिना समझे, बिना जाने कुछ भी बोल देने की मानसिकता। कोई विशेष कारण नहीं।

बाल्यकाल की स्मृतियाँ अभी भी मन पर सुदृढ़ हैं, और मन मूल्यांकन में उलझा।

  • गरिमा संजय

4 thoughts on “गालियों की दुनिया”

  1. जंतर मंतर के धरना प्रदर्शन में Gen Z की गालीबाजी को अपने अच्छे ढंग इंगित कर दिया, महत्वपूर्ण गाली का सिलेब्स चेप्टर युवक युवतियों के पास इतना भद्दा और भौंडा क्लेक्शन है।

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