साप्ताहिक कहानी – 19 – 13 सितंबर, 2026
“चलो, अगली चुनौती।”
ऑफ़िस पार्टी के बीच खेल-खेल में चुनौतियों पर चुनौतियाँ चल रही थीं।
“बचपन में पढ़ाई गई कोई कविता सुनाओ सब लोग। नर्सरी-केजी से पहली क्लास तक की चलेगी।”
इस बार एचआर ले जा रही थी बचपन की उन गलियों तक जहाँ तक इस उम्र में आना-जाना बहुत ही कम हो जाता है।
शर्त मज़ेदार थी। सभी की आँखें ख़ुशी से चमक उठीं। अधिकतर के मन बचपन की सुनहरी यादों में खोने से लगे।
“सबसे पहले निधि…” एचआर की आवाज़ फिर से गूँजी। चूँकि अब तक के खेल में निधि जीत रही थी, इसलिए उसका नंबर सबसे पहले आ गया।
अभी तो वह ठीक से सोच-समझ भी न सकी थी। थोड़ा सोचा, फिर धुँधली याद के भरोसे धीमे-धीमे शुरू किया…
“उठो लाल, अब आँखें खोलो, पानी लाई हूँ मुँह धो लो…”
वह ही नहीं, सभी सहकर्मी भी अब तक बचपन की कक्षाओं में पहुँचने लगे थे।
जैसे-जैसे आगे की पंक्तियाँ पढ़ रही थी, निधि के मानस-पटल पर धुँधलाई सी यादें ताज़ा हो उभरने लगीं, और कविता की अगली पंक्तियाँ बोलने लगी…
“चिड़िया चहक उठी पेड़ों पर, बहने लगी हवा अति सुंदर…”
कविता, जिसमें जिसमें रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने प्रकृति के सौन्दर्य के साथ सुबह जल्दी जागने का संदेश दिया था…
“ऐसा सुंदर समय न खोओ, मेरे प्यारे अब मत सोओ।”

अंततः विजेता रही निधि को बधाइयाँ मिलने के साथ ही, शुरू हो गया बचपन की यादों को ताज़ा करने का सिलसिला।
अजब संयोग था। आज वह बचपन की कविताओं में अपना बचपन जी रही थी और कल उसे अपनी बेटी के दाखिले के लिए प्री-स्कूल जाना है।
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अगली सुबह, विद्यालय परिसर में प्रवेश करते ही निधि के कानों पर छोटे-छोटे बच्चों के सामूहिक स्वर पड़ने लगे। अनायास ही मन ने उस स्वर को शब्द दे दिए, “उठो लाल, अब आँखें खोलो…” और क़दम बच्चों के स्वर की ओर ही बढ़ने लगे।
बच्चों के स्वर तेज होते जा रहे थे, किंतु जल्दी ही महसूस हुआ कि उनके शब्द तो कुछ और थे। सुनने के प्रयास में निधि और निकट जाने लगी, और धीरे-धीरे स्वर स्पष्ट होने लगे…
“एक मोटा हाथी झूम के चला, मकड़ी के जाल में वो जा के फँसा
जाल को देखा, देख वो डरा, दूसरे हाथी को इशारे से बुलाया…”

आँ! निधि चौंक उठी। शब्दों को सुन सबसे पहले उसकी हँसी छूट गई। “ये कैसे बोल हैं!” वह हैरान थी।
क्या सचमुच? मोटा हाथी मकड़ी के जाले में फँस गया?
घने जंगलों में निडर होकर घूमने वाला मोटा हाथी क्या इतना डरपोक कि वो मामूली मकड़ी के जाले से डर गया?
कविता के मतलब को समझने की कोशिश में निधि की हँसी धीमे-धीमे गुम होने लगी।
“यह क्या सिखा रहे हैं बच्चों को? मकड़ी के जाले से हाथी डर गया? या मकड़ी के जाले से बच्चों को डरना सिखाया जा रहा है?”
टीचर से बात की ज़रूर, लेकिन उनका कहना था, बच्चों को ऐसी तुकबंदियाँ अच्छी लगती है।
“तुकबंदियाँ तो अच्छी लगती हैं, लेकिन शब्दों की भी तो कुछ सार्थकता होनी चाहिए?
शब्दों के माध्यम से दिए जा रहे संदेश में कुछ सार्थकता नहीं होनी चाहिए?”
निधि का मन तुकबंदी, शब्दों और संदेश के आंकलन में लगा रह गया।
बच्चों के मानस-पटल पर शब्दों का असर दशकों तक अंकित रहता है… कभी-कभी जीवन-पर्यन्त भी!
क्या शब्दों की सार्थकता आवश्यक नहीं?
• गरिमा
