किल-किल काँटा

साप्ताहिक कहानियाँ – 07 – 20 जून, 2026

किल-किल काँटा - बचपन का भूला-बिसरा खेल

गर्मी की छुट्टियाँ। तपती दोपहरी में घर में बंद बच्चे। खाना खाने के बाद आम भी खा लिया गया। अब कितनी देर तक घर में बंद रहा जाये? हर बच्चे के मन में एक ही सवाल। धूप अब भी तेज़ थी, लेकिन अब उन्हें घर में रोकना कठिन था। किसी को घर में लूडो या साँप-सीढ़ी खेल में बहलाया गया और किसी को थोड़ी देर सोने का निर्देश दिया गया। जैसे-तैसे चार बजे।

और देखते ही देखते सभी बच्चे गली में थे। सभी दो टोलियों में बँट गए। सबके हाथों में एक-एक चाक या खड़िया का टुकड़ा। गली के एक सिरे का कुछ भाग एक टोली का और दूसरे सिरे का कुछ भाग दूसरी टोली के हिस्से में आया।

इसके साथ ही शुरू हो गया किल-किल काँटे का खेल।

किसी चबूतरे की सीढ़ी पर, तो किसी दरवाज़े के पीछे, किसी पेड़ के तने पर, किसी पत्थर के नीचे, किसी ईंट पर और किसी दीवार पर। सफ़ेद चाक या खड़िया से लकीरें खींचते बच्चे।

“ओवर” की आवाज़ के साथ ही सब जहाँ थे वहीं रुक गए। अब बारी थी एक दूसरे की बनाई लकीरों को ढूँढ़कर काटना। खेल के अंतिम चरण में – दोनों टोलियों ने अपनी-अपनी बची हुई लकीरों को गिना। जोड़-घटाना हुआ और विजेता घोषित।

किल-किल काँटा - AI द्वारा बनाया गया चित्र

आज उन बच्चों के बच्चे भी बड़े हो चुके हैं। युवा हों या बालक, अब वे खेलने के लिए भरी दोपहरी गलियों में भटकते नहीं फिरते।

उनके पास ठंडे, वातानुकूलित कमरों में बैठकर खेलने के लिए अनगिनत गेम हैं।

ये गेम खेलने के लिए उन्हें संगी-साथी भी नहीं चाहिए। इन वीडियो गेम्स को तो वे अकेले भी खेल लेते हैं, अपने मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर, टेबलेट वगैरह पर।

अब वे खेल में चाक या खड़िया से सफ़ेद लकीरें नहीं खींचते।

उनमें से कुछ युवा ऐसे भी हैं जो आज भी सफ़ेद लकीरें खींचते हैं। बहुत ही घातक लकीरें।

वो लकीरें जो खेल नहीं होतीं।

वो लकीरें जो जीवन से खेल जाती हैं।

© गरिमा संजय

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