साप्ताहिक कहानियाँ – 06 – 14 जून, 2026
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पक्षियों-सा जीवन –
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चूँ-चूँ करती आई चिड़िया, दाल का दाना लाई चिड़िया।
घर की मुँडेर पर झुकते पेड़ की सख़्त डाल पर चिड़िया का छोटा-सा घोंसला, और उसमें चीं-चीं करते दो छोटे-छोटे बच्चे।
माँ के आते ही फुदकने लगते और माँ अपनी चोंच में लाए दाने बच्चों को खिलाती!
अद्भुत मनभावन दृश्य!
हृदय को अजब सा सुख देता बच्चों के लिए माँ का उद्यम।
माँ को देखते ही बच्चों का उत्साह हृदय को आह्लादित करता।
कुछ ही दिनों में बच्चों के पंख सख्त होने लगे और देखते-देखते एक डाल से दूसरी पर पहले फुदकने और फिर उड़ने भी लगे।
कुछ और सप्ताह बीते ही थे, कि एक दिन दोनों बच्चे घोंसले से गायब थे।
उड़ चले थे वो दोनों, चहकते, उस अनंत आकाश में।
सर्द-गर्म हवाओं के थपेड़ों के बीच।
विशाल पक्षियों के प्रहारों से बचते, निकलते, उड़ चले थे वे विस्तृत अनंत आकाश में।
गुंजायमान करते क्षितिज तक धरती आकाश को, अनगिनत रंग भरते उस अनंत विस्तार में।
बहुत कुछ समझता, सीखता मेरा वयस्क मन बाल्यकाल से वापस आकर खोजने लगा घर की छत को, छत की मुँडेर को, और उसपर झूलती पेड़ की डाल को।
खोजने लगा चिड़ियों के घोंसले।
खोजने लगा चूँ-चूँ करते बच्चों को दाना खिलाती माँ चिड़िया को,
और खोजता रह गया सुबह-साँझ चहचहाते, रंग-बिरंगे, नाना प्रकार के छोटे-बड़े पंछियों के संसार को।
© गरिमा संजय

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