महाभारत, जीवन की

साप्ताहिक कहानी – 17 – 30 अगस्त, 2026

“युद्ध का पहला दिन। महान योद्धा अर्जुन का रथ लेकर भगवान श्रीकृष्ण युद्ध-भूमि पर पहुँचे। सामने की सेना में अपने ही चाचा, मामा, दादा, पितामह, गुरुओं और भाई-बंधुओं को देखकर परम वीर अर्जुन का दिल पीड़ा से भर गया।

“इनसे कैसे युद्ध करूँ? युद्ध तो परायों से करते हैं, यहाँ तो सब अपने ही हैं!”

दादी की कहानी में खोई निधि ने पूछा, “फिर क्या हुआ, दादी?”

“फिर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें भगवद्गीता का ज्ञान दिया। अपना विराट स्वरूप दिखाया। और समझाया कि कैसे संसार के सभी प्राणी एक परमेश्वर से जन्म लेते हैं और उनमें ही विलीन हो जाते हैं।”

“कैसे दादी?”

“अब, वो जब तू बड़ी हो जाएगी तब समझेगी।”

दादी समझ रही थीं कि हर बात नौ-दस वर्ष की बच्ची को समझा पाना आसान नहीं था। किंतु वह यह भी जानती थी कि बालमन पर पड़े बीज अंकुरित होते रहते हैं और सही उम्र आने पर उनके अर्थ भी समझ में आ जाते हैं।

उन्होंने कहानी जारी रखी...

“श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि वो धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए अपने कर्म पर अडिग रहें।”

“तो दादी, अगर श्रीकृष्ण भगवान दुर्योधन को ये बातें समझा देते तो अच्छा नहीं होता? वो तो भगवान थे। वो समझा देते तो दुर्योधन उनकी बात मान जाता और युद्ध नहीं होता।”

“ऐसा नहीं है बेटा कि भगवान श्री कृष्ण ने दुर्योधन को समझाने का प्रयास नहीं किया था। जब वे पाण्डवों के दूत बनकर हस्तिनापुर गए थे उस समय उन्होंने पूरी राज—सभा को धर्म का ज्ञान दिया था।”

“तो वो उन्हें भी अपना विराट रूप दिखा देते। तब तो समझते!” बालमन की जिज्ञासा ने प्रश्न किया।

“वो भी किया था, बेटा। लेकिन दुर्योधन ने उन्हें मायावी बताकर बाँधने की कोशिश की।”

“अरे! क्या वह मूर्ख था?”

“अहंकार में डूबा इंसान हठी हो जाता है, बेटा। फिर ईश्वर साथ छोड़ देते हैं और उसकी ज़िद पूरी होने देते हैं।”

दादी के शब्द निधि के मन पर घर गए, भले ही उसे हर बात ठीक से समझ में नहीं आई थी।

“फिर?”

“फिर श्रीकृष्ण भगवान हस्तिनापुर से वापस चले गए। और उन्होंने युद्ध होने दिया। उस युद्ध में अपनों ने ही अपनों को मारा। लाखों लोग मारे गए। लाखों परिवार उजड़ गए।”

दादी ने निधि और उसके भाई-बहनों को सैकड़ों कहानियाँ सुनाई होंगी। लेकिन यह एक कहानी लगभग बीस बरस बीतने के बाद भी निधि के दिल पर छपी हुई है।

Photo: AI Generated

आज दादी की बरसी है। भोज के बाद अपने कमरे में चाय का प्याला लिए निधि मन कहानी के निष्कर्ष पर पहुँच रहा है,

“हाँ, सच ही रहा होगा... अहंकार और हठ के आगे ईश्वर भी मार्गदर्शन छोड़ देते हैं।

फिर वही होता है जिसका हम हठ कर रहे थे। फिर उसका परिणाम भुगतते हैं।

लेकिन अक्सर अहंकारी और हठी के व्यवहार का परिणाम आसपास बहुतों को भुगतना पड़ता है।”

  • गरिमा

1 thought on “महाभारत, जीवन की”

  1. सटीक विश्लेषण। इंसानी मानसिकता ही उसके पतन का कारण होती है।

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