दरवाज़ा बंद ही रहा…

अच्छा किया जो जाते समय दरवाज़ा बंद कर गए थे
निर्णायक, भाग्य विधाता बना यह दीवार सा खड़ा रहा!
क्या नादान थे, भूल गए? या जाना ही न था…
अनुभूतियाँ कैद कर ले, ऐसा कोई दरवाज़ा तो बना नहीं
यादों पर ताला लगा दे ऐसा तो कोई दरवाज़ा होता नहीं
क्या हुआ, जो जाते समय दरवाज़ा बंद कर गए थे?

लेकिन वक़्त भी आख़िर कब तक अट्टहास करता?
बर्फ़ीली हवाओं से, बारिशों के पानी से, चिलकती धूप से
भूल गए थे, दरवाज़ों पर भी सुराख बनने लगते हैं?
यादों की धूल बंद कमरों में भरने लगती हैं!
आस की धूप उन सुराखों से झाँकने लगती है
चटकते दरवाज़ों से फिर से अतीत वापस आने लगता है!
क्या फ़ायदा, जो जाते समय दरवाज़ा बंद कर गए थे?

बस इतना कि उस दरवाज़े को दीवार मान,
पीछे आ न सकी
ख़ुद ही खींची लकीरों को फांद न सकी
दहलीज़ों से पार कभी जा न सकी…
पर इन सुराखों का क्या?
यूँ ही बंद रह जायेगा दरवाज़ा … सुराख बढ़ते ही जाएँगे
झरता, चिटकता, चरमराता सा खड़ा तो रहेगा
जर्जर होते चटकते दरवाज़ों से प्राण आसानी से निकल जाएँगे…

© Garima Sanjay

16 अप्रैल, 2020

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