साप्ताहिक कहानियाँ – 03 – 23 मई, 2026
“21 मई को अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस मनाते हैं? ठंडे देशों में तो ठीक है, किंतु भारत में भी?” 22 मई की दोपहर, चाय की चुस्कियों के साथ इस बात पर विचार करती वह हौले से मुस्करा दी।
“मुझे भी चाय पीनी है!” बचपन का किस्सा चलचित्र के समान आँखों के आगे तैर गया।
ढाई-तीन बरस की बच्ची का आग्रह सुनकर परिवार में सभी अचरज में पड़ गए थे। कोई हँसा, तो किसी ने मीठी सी फटकार भी लगाई।
जन्म से देख रही थी, गुनगुनी सुबह हो या धुँधलाई साँझ, जब भी कुछ बड़े मिलते तो चाय पीते और साथ करते ढेर सारी बातें। कुछ गंभीर तो कुछ हास्य-विनोदपूर्ण भी। तभी से तो दिल में समा गया था कि बड़ों के समूह में सम्मिलित होने की अनिवार्य अर्हता होती है, चाय! कुल मिलाकर, जब चार लोग साथ मिल बैठें तो चाय तो बनती ही है।
उसके मन से अनजान मुश्किल से पाँच-छह वर्ष बड़ी बहन ने समझाने का प्रयास किया – “चाय पिएगी तो साँवली हो जाएगी।”
जवाब आया – “तो क्या? कृष्ण जी भी तो साँवले थे!”
बालबुद्धि का बाल-हठ। मन में समा चुका था कि चाय पीने से ही बड़ों के गिरोह में सम्मिलित हुआ जा सकता है। तो कृष्ण भगवान की शरण भी ले ली।
माँ ने पिता की ओर देखा, आख़िर उनका ही तो नियम था कि बच्चों को चाय नहीं मिलेगी। लेकिन नन्हीं सी बच्ची के तर्क पर पिता हँस दिए।
माँ ने फिर से परिवार की सबसे छोटी बेटी की ओर देखा।
उसकी आँखों में न जाने कैसा आग्रह था, कि माँ ने भी अनुमति दे दी।
इसी के साथ आरंभ हुई बड़ों जैसा महसूस करने की यात्रा। यह तो नहीं पता कि बड़ों ने उसे अपने गिरोह में सम्मिलित किया या नहीं, लेकिन उसने स्वयं ही स्वयं को उस गिरोह का सदस्य मान लिया।
चाय प्रेम की इस यात्रा को आगे चलकर कभी पारले-जी का साथ मधुर साथ मिला तो कभी पढ़ाई के लिए रात में नींद भगाने का भ्रम भी।

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अनेक पड़ावों को पार कर चाय आज भी साथ है। सर्दी में ही नहीं, गर्मी में भी। लेखक हृदय की अनन्य साथी। हर यात्रा में निरंतर साथ देने वाली सहयात्री। कभी समय के अनुशासन में बँधी सामने आ जाती तो कभी मन की थकान मिटाने को और कभी विचारों में ताज़गी लाने का बहाना बनती।
आज की चाय किसी मौसम पर भी निर्भर नहीं है। कड़कती सर्दी में चाय की प्याली से उठती भाप आनंदित कर देती है, वहीं रिमझिम बरसते मौसम में अंतस को सुलगाती, और गर्मी हो तो भी बहाने मिल ही जाते हैं… कभी वर्षों पुरानी आदत का बहाना तो कभी थकन मिटाने का बहाना।
आज चाय के लिए किसी मानवीय साथ की आवश्यकता नहीं। जिस तरह लोगों के समूह में सम्मिलित होने के लिए चाय पीने की लालसा जगी थी, वह लालसा तो बहुत पीछे छूट गई।
आज तो चाय पीने के लिए केवल वह हो और उसके विचार, उसकी लेखन सामग्री, पार्श्व में पसंदीदा संगीत और एक प्याली चाय।
लोगों के समूह में सम्मिलित होने की अभिलाषा के साथ आरंभ हुई यह यात्रा, आज मधुरिम एकांत में सिमट गई है।
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बहुत गर्मी है चलो चाय पीते हैं
थक गए चलो चाय पीते हैं
बोर हो रहे चलो चाय पीते हैं
ठंड और बारिश मे तो बहुत बहाने है
सच मे
बहुत ख़ूब! चलो, चाय पीते हैं! 😊☕️