साप्ताहिक कहानी – 22 – 3 अक्टूबर, 2026
“भैया, पाँच चुरमुरे। मेरी वाली में मिर्च नहीं, और मूँगफली एक्स्ट्रा।” चहकती-फुदकती स्कूल के गेट से बाहर आती गौरी जब तक राम आधार भैया से बोलती, भैया ने अपना काम शुरू कर दिया था। मिर्च की बात पर हल्का-सा हँसकर बोले, “जानते हैं, बिटिया।”
स्कूल के गेट के ठीक सामने राम आधार भैया का चुरमुरे का खोमचा। लड़कियों की भीड़ छँटने के साथ ही गौरी और उसकी सहेलियाँ चुरमुरा खाने जा पहुँची। स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी, लेकिन उन लोगों को कुछ समय रुकना पड़ता था। किसी को सेकेण्ड शिफ़्ट की बस के लिए, और किसी को रिक्शे के इंतज़ार में, तो किसी के घर वाले ही देर से लेने आते थे।
ये सभी सहेलियाँ साथ खेलती, खातीं और समय आने पर घर के लिए निकल पड़तीं। स्कूल के बाद स्कूल में चालीस-पचास मिनट एक्स्ट्रा रुकने का मतलब थोड़ी भूख तो लगेगी ही। ऐसे में राम आधार भैया के चुरमुरे का ही सहारा होता।
भैया व्यस्त हो गए खटाखट पाँच चुरमुरे बनाने में और गौरी और उसकी सहेलियाँ वहीं खड़ी होकर भैया की कलाकारी को निहारने लगी।
लाई, सेंव, प्याज़, धनिया पत्ती, मिर्च, नींबू और कुछ सूखे मसालों की नपी-तुली मात्रा, जिन्हें सधे हुए हाथों से मिलाकर चुरमुरा बनाते राम आधार भैया। खोमचे के एक कोने पर एक ही आकार के कटे हुए करीने से दबे काग़ज़ के टुकड़े। बर्तन में सारी सामग्री मिलाकर, एक-एक काग़ज़ उठाते, कोन बनाते, उनमें समान मात्रा में चुरमुरा भरते, ऊपर से थोड़ा सेंव और एक्स्ट्रा मूँगफली के दाने डालते।
कारीगरी कुशल, तालमेल एकदम परफेक्ट। कोई भी दो चुरमुरा अलग सा नहीं लगता। सब बिल्कुल एक समान। सबमें बराबर मात्रा में सामग्री और सबमें बराबर मात्रा में एक्स्ट्रा वाली मूँगफली भी। हाँ, गौरी के चुरमुरे में मिर्च नहीं। दस-बारह बरस की इन लड़कियों के लिए राम आधार भैया किसी एक्सपर्ट से कम नहीं थे।
बारहवीं पास करने तक राम आधार भैया का चुरमुरा स्कूली जीवन का नियमित साथी बना रहा। इसके बाद यूनिवर्सिटी में वुमन्स कॉलेज के सामने का चुरमुरा हो या सिविल लाइंस में सॉफ़्टी-कॉर्नर वाला – हर जगह के चुरमुरे मशहूर थे, लेकिन जाने क्यों उसके बाद वो वाला स्वाद न आया।
शायद उस चुरमुरे में बचपन की निश्चिंतता का स्वाद था।
शायद उसमें सहेलियों के साथ का स्वाद था।


समय बदला, दुनिया बदली और शहर भी बदला।
आज बेटी के स्कूल के सामने वैसा ही खोमचा देखते ही राम आधार भैया का चुरमुरा फिर याद आ गया।
लेकिन उसमें चुरमुरा नहीं। दरअसल चुरमुरा इस शहर में मिलता ही नहीं।
यहाँ चुरमुरे की जगह भेल-पूरी मिलती है, जो बचपन के स्वाद से मेल नहीं खाती।
उस पर स्कूल ही नहीं, पति की ओर से भी कड़ी हिदायत है – स्कूल के बाहर मिलने वाली चीज़ें नहीं खानी। लोगों का मानना है, कि खोमचे वाले चूरन आदि के बहाने कुछ भी मिला देते हैं, जो बच्चों के लिए ठीक नहीं।
गौरी अनकहे, अबूझ को बूझने का प्रयास कर रही थी – बचपन का वो स्वाद बचपन के साथ ही जा चुका है।
अब कहीं मिल नहीं सकता।
अपने बच्चों के बचपन में भी नहीं।
• गरिमा
