ट्रेन की यात्रा

साप्ताहिक कहानी – 21

“पारुल बेटा, मैंने आलू छील दिए हैं, लहसुन अदरक का पेस्ट बनाकर इसकी सब्ज़ी बना लो। मैं माँ के साथ मिलकर पूड़ियाँ तल लेता हूँ। विपुल से बोलो अख़बार थोड़े अधिक रख लेगा और दोनों सुराही भर ले।”

तभी माँ ने आवाज़ दी, “मयंक बेटा, टिफ़िन धुलवा दिया है। ख़ूब अच्छे से पोंछकर सुखा लो।”

यह वो समय था जब कहीं घूमने जाने का माध्यम आमतौर पर रेलगाड़ी ही हुआ करती थी।

यह वो समय था जब रेलगाड़ी की यात्रा लंबी होती थी, क्योंकि फ़ास्ट, सुपर फ़ास्ट या एक्सप्रेस ट्रेन अधिक नहीं हुआ करती थीं।

यह वो समय था जब हर स्टेशन पर रुक-रुककर जाने वाली धीमी चाल की रेलगाड़ियाँ होती थीं।

वो रेलगाड़ियाँ जिन पर यात्रा करने के लिए केवल कपड़े और निजी उपयोग के सामान ही नहीं रखने होते थे। जितने दिनों की यात्रा, उतने दिनों के हिसाब से खाने-पीने का प्रबंध करना पड़ता था, सोने के लिए बिस्तरबंद और पानी के लिए छोटी-छोटी सुराही रखनी होती थीं।

यह वो समय था जब रेलगाड़ी की यात्रा के लिए एक पूरी गृहस्थी साथ बँधकर चलनी होती थी।

ट्रेन में बैठे अभी आधे घंटे भी न हुए थे कि मयंक और विपुल को भूख लग आई। माँ ने आटे के बिस्कुट देकर उन्हें बहलाया, और पिताजी से शिकायत करने की धमकी भी दी।

हालाँकि पिताजी उस समय तक न जाने कितने अंकलों के साथ जान-पहचान बनाने में व्यस्त हो चुके थे।

खाने का समय होते ही अलग-अलग तरह के पूड़ी-आलू-भिंडी-गोभी की सब्ज़ी, बैंगन और करेले की कलौंजी, आम, नींबू और मिर्च के अचार की सुगंध पूरे कम्पार्टमेंट में फैल गई।

पिताजी के नए मित्रों के परिवारों के साथ खाने का आदान-प्रदान हुआ। हालाँकि खाने में नशा मिलाने के किस्से उस समय तक आम हो चुके थे। फिर भी कुछ पिताजी का साहस और कुछ उनके नए मित्रों का। या, कह सकते हैं, दोनों के बीच भरोसा। या शायद किस्मत – जिसने उस समय धोखा न दिया। और इन्हीं संभावनाओं के बीच चलती रही उन दिनों की यात्राएँ।

Photo Source: Social Media, Internet

“मैम, आपका वेज मील।”

वंदे भारत के एसी कोच में यात्रा कर रही पारुल सहसा अतीत के पन्नों को बंद करती वापस लौट आई। नवीनतम टेक्नोलॉजी के साथ लगभग डेढ़-सौ किलोमीटर प्रति घंटे की गति से दौड़ती वंदे भारत एक्सप्रेस। बस, कुछ ज़रूरत के सामान रखें और सवार। खाना, पानी, नाश्ता, चाय सबकी सुविधा रेलवे द्वारा उपलब्ध।

कहाँ वो छोटी सी गृहस्थी बाँधकर थके-हारे, मंज़िल तक पहुँचना, और कहाँ ये ज़रूरत भर का सामान लेकर ऐसी यात्रा जो कुछ ही घंटों में गंतव्य तक पहुँचा दे।

अब सबकुछ पैक्ड – पैक्ड खाना, बोतल में बंद पानी। प्रीमिक्स चाय, सूप, नाश्ता, खाना, दही, अचार, आइसक्रीम और मिठाई – पैक्ड बर्तनों में सबके लिए अलग-अलग खाना।  

अब नए लोगों से दोस्ती करने की ज़रूरत नहीं। खाना साझा करने की ज़रूरत नहीं।

अब बिना किसी चिंता के, साफ़-सुथरा, खाना खाकर यात्राएँ पूरी करते, अलग-थलग लोग।

  • गरिमा

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