साप्ताहिक कहानी – 20
“भैया की चिट्ठी आई?”
डाकिये को घर से बाहर निकलते देख, स्कूल से लौटती निधि ने माँ से पूछा। सुनकर माँ ने उसकी चिट्ठी उसके हाथ में थमा दी। निधि जल्दी से भैया की चिट्ठी पढ़ने बैठ गई। भैया की चिट्ठियों में उनके बड़े शहर का ढेर सारा हालचाल होता था। निधि को पिछली चिट्ठी भेजने से लेकर इस चिट्ठी तक का बहुत सारा सफ़र होता था। रहन-सहन की जानकारी होती थी और देश-विदेश के समाचार का पिटारा होता था।
भैया के पत्रों के साथ निधि बड़ी हो रही थी। एक औपचारिक पढ़ाई स्कूल में चलती तो दूसरी शिक्षा भैया की चिठ्ठियों से मिलती रहती। एक-दो पेज के हालचाल की चिट्ठी कभी आई हो, या इनलैंड लेटर से काम चलाया हो, ऐसा तो कभी याद ही न था। पोस्टकार्ड जितनी संक्षिप्त चिट्ठियों की तो उनके संवाद में कभी कोई जगह ही न थी। निधि और उसके भैया की चिट्ठियों में सबकुछ था – भावनाएँ, समाचार और सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक जानकारी। साथ ही उनमें जुड़ा होता भाषा का अप्रत्यक्ष ज्ञान। व्याकरण और वर्तनी की अशुद्धियों को दूर करने के सुझाव, जो बचपन से ही उसकी भाषा को शुद्ध बनाते रहे।
ऐसी चिट्ठियों में कुछ भी संक्षिप्त रह ही नहीं पाता था। बस, एक ही कमी होती, कि चिट्ठियाँ पहुँचने में कम से कम तीन-चार दिन लग जाते थे। और फिर वापस जवाब आने में फिर से तीन-चार दिन का समय। वो भी अगर भैया को उसी शाम जवाब लिखने बैठने का समय मिल गया था। वरना दो-चार दिन और भी लग जाते।

मोबाइल के नोटिफ़िकेशन से ध्यान टूटा। आज कोई नहीं जो चिठ्ठी भेजे। न ही चिठ्ठियों का इंतज़ार होता है। लंबे हालचाल लेना-देना अब होता ही नहीं। अब तो कामकाज से जुड़े हैं तो ईमेल का इंतज़ार होता है वरना दोस्तों-परिवार में मैसेज भेजी जाती हैं। कुछ शब्दों या एकाध टूटे-फूटे वाक्यों के मैसेज। न पूरे सवाल न पूरे जवाब। शब्द-हीनता में सिमटती भावहीनता। तुरंत पहुँच जाने वाले संदेशों के उत्तर देने में भी भावशून्य देरी। स्वयं आहत होते, स्वयं आहत करते, निरंतर अकेले होते जाते लोग।
• गरिमा
